Saturday, October 7, 2017

किसी भी तौर से बेकारियां नहीं चलतीं

तरही ग़ज़ल
बह्र - 1212/1122/1212/22

किसी भी तौर से बेकारियां नहीं चलतीं
ग़मों की भीड़ में लाचारियां नहीं चलतीं।

बहुत से लोग मुहब्बत में भूल जाते हैं
वफ़ा की राह में मक्कारियां नहीं चलतीं ।

हमारे दिल में ज़माने का दर्द है साहिब।
हमारे सामने ग़मख़्वारियां नहीं चलतीं

अना को जीत के खुद को है हारना इसमें
दिलों के खेल में खुद्दारियां नहीं चलतीं

ज़मीं पे चलते अगर हुक्मरान अपने तो
ज़मीने-मुल्क पे दुश्वारियां नही चलतीं

दुआ सलाम सलीक़ा सुख़न में हैं जायज़
अदब के नाम पे अय्यारियां नहीं चलतीं।

राजीव कुमार
Rajeev Kumar
raj28094gmail.com

Monday, October 2, 2017

फकत खुदा ही नहीं हां बशर भी शामिल है

ग़ज़ल
बह्र 1212 1122 1212 22

फकत ख़ुदा ही नहीं हां बशर भी शामिल है
मकान ए जिस्म में जैसे जिगर भी शामिल है

हको हकूक की बातें तो करता हूं लेकिन
मैं सच कहूं तो मिरे सच में डर भी शामिल है

हर इक सफर में फकत मुश्किलें नहीं होती।
किसी किसी में हसीं राहबर भी शामिल है

खुदा के घर हैं ये दैरो हरम मगर देखो।
श़हर की आग में इनका शरर भी शामिल है

तेरा हिसाब करोड़ों का हो गया लेकिन
तेरे हिसाब में मेरा शिफ़र भी शामिल है

तुम्हारे हुस्न में इक तुम ही तो नहीं जाना
तुम्हारे हुस्न में मेरी नजर भी शामिल है

राजीव कुमार

शिफर=शून्य

झूठ जब से आप का सन्नाम है

ग़ज़ल

झूठ जब से आप का सन्नाम है
सच हमारा तब से ही बेकाम है

दौरे हाजिर में किसी की दोस्ती
यूं समझिये आप से कुछ काम है

इक सदी इक साल कहते हो जिसे
कुछ नहीं वो सिर्फ सुब्हो शाम है

हां वही मैं आदमी हूं दोस्तो
आप की खातिर जो बिल्कुल आम है

अक्ल दो कौड़ी की होके रह गयी
चापलूसी का ही अच्छा दाम है

मीडीया में आज कल का मसअला।
या तो हिन्दू है या फिर इस्लाम है

खूं जला के क्या कमाया बोलिये
आखिरी पैसा है या फिर नाम है ?

राजीव कुमार

सच बताउं आप को संसार का

सच बताउं आप को संसार का
झूठ के आगे है सच बेकार का

डूबती हैं मुफलिसों की बस्तीयां।
किस तरह का जस्न है सरकार का

दफ्तरों के चक्करों में घुट गया
देख लीजे दम किसी लाचार का

नाम से पहचानता ही कौन है
अब जमाना है मियां आधार का

पेन पेन्सिल कुछ किताबें तख्तींयां
छोड़ीये अब काम क्या हथियार का

मंच पर चमचागीरी करते रहो
फन यही है आज के फनकार का

राजीव कुमार

Sunday, September 17, 2017

अपने चेहरे पे नया चेहरा लगा भी न सकूँ।

ग़ज़ल

अपने चेहरे पे नया चेहरा लगा भी न सकूँ।
आईना देख के मैं खुद को छुपा भी न सकूँ।

ये जो किस्सा ए मुहब्बत है मिरे सीने में
ये वो किस्मत का लिखा है जो मिटा भी न सकूँ।

चन्द टुकड़े है ये कागज के मगर जाने क्युँ
खत तेरे चाहूँ जला दूं तो जला भी न सकूँ।

जिस्म की हद से बहुत दूर इस लिये आया।
तू बुलाये तो कभी लौट के आ भी न  सकूँ।

मै बहारों की हिमायत तो नहीं करता हूं ।
फिर भी चाहुंगा खिजाओं को बुला भी न सकूँ ।

चोट खा कर ये मेरा दिल भी किसी बच्चे सा।
जब भी रोये मैं इसे हस के हसा भी न सकूँ।

ये जमाना है जमाने से गिला क्या करना।
खुद से लड़ के जो अगर खुद को मिटा भी न सकूँ

राजीव कुमार

Friday, September 15, 2017

हर एक शब मिरे दिल में अजाब आता है

आज की फिलबदीह ग़ज़ल

हर एक शब मिरे दिल में अजाब आता है
न जाने क्यों मुझे तेरा ही ख्वाब आता है

ये किस तलाश के सहरा में आ गये हैं हम।
कदम कदम पे हमारे  सराब आता है
सराब - मरीचिका

तमाम उम्र गुजारी है जिसकी हसरत में ।
वही तो बन के इन आंखों में आब आता है

है बदहवास हर इक शै हर एक मंजर क्युं
मिरे सवाल का किसको जवाब आता है ।

चलो चलें कि सितारों से बात करनी है
उन्ही के साथ साथ माहताब आता है

मिरे ख्याल का जुगनू कभी कभी यारों
ग़ज़ल की शक्ल लिये आफताब आता है ।

राजीव कुमार

जिन्दगी क्या है इक जुआ पगली

फिलबदीह ग़ज़ल

जिन्दगी क्या है इक जुआ पगली
कौन इसमें है जीतता पगली

जिस्म से इश्क भूल जा पगली
रूह से रूह को मिला पगली

मर्ज अपना मुझे बता पगली
मैं हूं हर मर्ज की दवा पगली

क्या इरादा है ये बता पगली
देख यूं ही न मुस्कुरा पगली

रात भर खूब शोर करता है
तेरी यादों का काफिला पगली

मेरे मन की तो जानती है तू
अपने दिल की भी तो बता पगली

इश्क क्या है तुझे बताउंगा
पहले चलते हैं मयकदा पगली

हमकदम बन के गर चलेगी तो
कट ही जायेगा रास्ता पगली

दूर तक था धुंआं धुंआं लेकिन
एक बादल भी उसमें था पगली

खोटे सिक्कों के इस जमाने में
सिक्का अपना भी तू चला पगली

तेरी आंखें बता रहीं हैं सब।
लब से कुछ भी तू मत बता पगली

नाम से मत मुझे बुलाया कर
तू भी पागल मुझे बुला पगली

जिन्दगी चार दिन की मेहमां है
यूं ही तन्हा न तू बिता पगली

राजीव कुमार

Sunday, August 27, 2017

ये इश्क यूं तो बुरा नहीं है

 ग़ज़ल

ये  इश्क  उतना  बुरा  नहीं है।
के जब तलक ये हुआ नहीं है।

हमें  पता  है  तुम्हारे  दिल में।
हमारी  ख़ातिर  वफ़ा  नहीं है।

स्याह   रातें   उदास   मौसम।
ये  दर्द  सबको  पता  नहीं है।

मैं आईना बन गया हूं लेकिन।
वो  अक्श  मेरा  बना  नहीं है।

जिसे मैं अपना समझ रहा था
वही तो सच मुच मिरा नही है।

वो  नापता  है  हमारे  कद को
जो  यार  हमसे  बड़ा  नहीं है।

शहर जलाया है जिसकी खातिर
वो  आदमी   है  ख़ुदा  नहीं  है।

अजीब दुनिया है जिसमें इन्सां
कभी  ख़ुदा  से  मिला  नहीं  है।

हमारी सोहबत में आ गया जो
वो  यार  खुद का  रहा  नहीं है।

राजीव कुमार 

आपकी निगाहों को शोखियां समझती हैं

गजल _1

आपकी निगाहों को शोखियां समझती हैं
हम नशे में हैं सारी मस्तीयां समझतीं है।

हर सितम हवाओं के नाज गुल फजाओं के
आप के ही जैसे ये तितलियां समझतीं हैं

आप की जुदाई में अब मिरा अकेलापन  
गर्मीयां नहीं लेकिन सर्दियां समझतीं हैं

फिर बहार जायेगी फिर खिजां भी आयेगी।
दर्द इन दरख्तों का टहनियां समझतीं हैं

चोट खुद पे करना है चोट खुद ही खाना है
मुश्किलें  इबादत की घंटियां समझतीं हैं

राजीव कुमार

मुल्क की हूकूमत को कुर्सीयां समझतीं हैं।

गजल-1

मुल्क की हूकूमत को कुर्सीयां समझतीं हैं।
हम अवाम हैं हमको सिसकियां समझतीं हैं

शह्र के खुदाओं ने आग क्युं लगायी है
खाक हो गयी हैं जो बस्तीयां समझतीं हैं

हर तरफ तबाही का ये हजूम कैसा है।
उठ रही किसानों की अर्थीयां समझतीं हैं

आप का महल वो जो हाथ से बनाते है
उन गरीब लोगों को झुग्गीयां समझतीं हैं

आज एक इन्सां जो आप का मसीहा है।
आप तो नहीं उसको लड़कियां समझतीं हैं।

राजीव कुमार

Monday, August 14, 2017

बस इक मैं ही नहीं तन्हा अकेले।

अकेले।

बस इक मैं ही नहीं तन्हा अकेले।
हर इक दुनिया से है जाता अकेले ।

बहुत कुछ जीत कर भी सोचता हुं।
मुझे खुद से भी है लङना अकेले।

मेरी ख्वाहिस हकीकत बन कभी तू।
ये जीना भी है क्या जीना अकेले।

गजल हो जायेगी मेरी मुक्मल।
कभी मिलने तो मुझसे आ अकेले ।

दिलों की दूरीयां आ कम करें हम।
कोई रिस्ता नहीं बनता अकेले।

राजीव कुमार

मुहब्बत को मिटाना चाहता है

मुहब्बत को मिटाना चाहता है
जमाना तो बहाना चाहता है।

खुदाया इस जहां में हर कोई क्यु।
किसी का दिल दुखाना चाहता है

नयी दुनिया पूराने लोग और हम
तू किसके साथ जाना चाहता है।

राजीव कुमार

पहले खुद पर तो एतबार करो

गजल

पहले खुद पर तो एतबार करो
फिर जमाने से रश्क यार करो

ये बूलंदी भी यूं नहीं मिलती।
कोशिशें दिल से बार बार करो।

जो न सोने दे चैन से तुमको।
ऐसी दौलत को दर किनार करो

अब तो फौलाद बन गया हूं मैं।
वार कोई तो जोरदार करो

छिन कर ये जमीं किसानों की
इनकी खुशियां न तार तार करो।

सुट महंगा तो था मगर यारों।
इतना महंगा न कारोबार करो ।

राजीव कुमार

इश्क इबादत और अकीदत थाम लिया

गजल

इश्क इबादत और अकीदत थाम लिया 
दुनिया भर का अपने सर इल्जाम लिया ।

ऐश परस्ती गुल्ली  डंडा लूका छिपी 
बचपन में यारों से कितना काम लिया।

नादां जिसको सदियां बर्षों कहते हैं
उन सदियों ने हमसे सुब्हो शाम लिया ।

बांट के उपर वाले को इन लोगों ने 
सिक्ख ईसाई हिन्दू और इस्लाम लिया।

जन्नत रहमत और जियारत भूल गया ।
बिटिया ने जब पापा कह के नाम लिया।

राजीव कुमार

हमारे दिल को जानेंजा भला कब तुमने समझा हे

गजल

हमारे दिल को जानेंजा भला कब तुमने समझा हे
समंदर कल भी प्यासा था समंदर अब भी प्यासा हे।

कई अहसास लेकर साथ जीना पङ रहा हे अब
न जाने कौन सा अच्छा बुरा बेहतर है उम्दा हे

मेरी हस्ती मेरी दुनिया मेरा लहजा मेरी खुशियां।
यही अब देखना है साथ मेरे कौन चलता है।

सहर से शाम तक की उम्र जी कर ये समझ आया
ये जीना भी है क्या जीना कि जब हर रोज मरना है।

जमाने की अदावत से बहुत उकता गया हुं मैं ।
किया है फैसला अब तो मुझे खुद से ही लङना है।

राजीव कुमार

दिल में नफरत के हर शै अंगारे हैं ।

आज की कोशिस

दिल में नफरत के हर शै अंगारे हैं ।
देखो  ऐसे  अच्छे  दिन  हमारे  हैं ।

मंदिर मस्जिद गिरजा हैं गुरुद्वारे हैं।
क्या जाने हम किस किस के सहारे हैं ।

हाथ में परचम आज अमन का है जिनके।
उनके ही हाथों हम सबकुछ हारे हैं।

भूख गरीबी महंगाई और काळा धन।
क्या अब भी ये सब मुद्दे हमारे है।

आन अना ईमान अकीदत और वफा।
मुश्किल में अब तो सारे के सारे है।

राजीव कुमार

Saturday, August 12, 2017

अरे राजीव क्युं पछता रहा है।

बस युं ही

अरे राजीव क्युं पछता रहा है।
यहां हर शक्स धोखा खा रहा है।

मुहब्बत काम है जब पागलों का
तू इसमें खुद को क्यु उलझा रहा है

जुदा होकर भी तुझसे जी रहा हूं
यही गम मुझको खाये जा रहा है

जिसे मैं पा ही जाना चाहता हूं
उसे ही मुझसे छीना जा रहा है

हिमायत कर रहा है रौशनी की
जो खुद भीतर से अंधेरा रहा है

वो निकला है अभी जो मयकदे से
वही गम ख्वार हसता जा रहा है

Rajeev kumar

Tuesday, August 1, 2017

इक हम ही तो नहीं है लाखों है बे सहारे

फिलबदीह गजल

रोयेंगे कब तलक कि गर्दिश में हैं सितारे
इक हम ही तो नहीं है लाखों है बे सहारे

जिन्दा रहेंगे तब तक जिन्दादिली रहेगी
गर मर गये तो इक दिन बन जायेगे सितारे

दुनिया से दुश्मनी कुछ इस तरह निभाई
हम दिल तो खूब हारे दिल से मगर न हारे।

रस्मो रवायतों की जब बेड़ीयों को तोड़ा
तब जान पाये दुश्मन अपने ही हैं हमारे

कश्मीरीयत को गोली जम्हूरियत ने मारी
इन्सानियत की बातें करते है झूठे सारे

मिल बैठ कर करेंगे गर बात मसअले पर
झगड़े फसाद सारे हो जायेंगे किनारे।

अच्छा चलो चलें अब ख्वाबों की सैर करने
चांद आ गया हैं छत पर संग लेके अपने तारे

राजीव कुमार

Friday, July 21, 2017

खुदा जानता है मैं क्या चाहता हूं

फिलबदीह ग़ज़ल

खुदा जानता है मैं क्या चाहता हूं
सभी के लिये मैं शिफा चाहता हूं

हर इक शक्स बीमार है इस जहां में
हर इक दर्द की अब दवा चाहता हूं

न हीरे न मोती न सोने न चांदी
मै बस आप सबकी दुआ चाहता हूं

 तुम्हारे लिये ही कमाई है दौलत
मै कब यार अपना भला चाहता हू

अरे वो कहां है जो सच बोलता था
उसे आज फिर देखना चाहता हूं

गुलों की हिफाजत तो कांटें करेंगे
फजाओं में ठंडी हवा चाहता हूं

ये दैरो-हरम आप ही के लिये हैं
मै खुद के लिये मयकदा चाहता हूं

मुझे मंजिलों की जरूरत नहीं है
मै हमराह बस आप सा चाहता हूं

राजीव कुमार
Rajeev Kumar

आप को हम जबान दे देकर

आप को हम जबान दे देकर
मर गये इम्तिहान दे देकर

बे तकल्लुफ रहा करो मुझ से
थक गया हूं मैं ध्यान दे देकर

जिन्दगी ये भी जिन्दगी है क्या
जी रहा हूं मैं जान दे दे कर

मन की बातें करा करो यारों
झूठे सच्चे  बयान दे देकर

दिल कहां अब किसी की सुनता है
दोस्त आजिज हैं ज्ञान दे देकर

पेट दुनियां का भर रहा है अब
जान अपनी किसान दे देकर

ऐसी माँयें हैं मुल्क में अपने
खुश हैं बेटे जवान दे देकर

राजीव कुमार
Rajeev Kumar

Thursday, July 13, 2017

रोये हालत पे अपने सूरत की

जब कभी आईने से कुर्बत की
रोये हालत पे अपने सूरत की

आज तालीम मुल्क की जैसे
पक्की बुनियाद है इमारत की

झूठ हर बार जीत जाता है
सच बताउं मैं क्या अदालत की

और भी लोग हैं बुरे फिर भी
आपने मुझसे क्युं बगावत की

मुश्किलातों ने उम्र भर हमसे
क्या कहूं कैसी कैसी हरकत की

वक्ते रुक्सत मुझे लगा मुझ पर
जिन्दगी ने बहुत अजीयत की

राजीव कुमार
शुभ रात्री

आओ चल कर देखें हम भी शहरों में

आओ चल कर देखें हम भी शहरों में
क्या रौनक है चलती फिरती लाशों में

कहने को तो बारिस की कुछ बूंदें थी।
लेकिन सब कुछ डूब गया है गावों में

देखा लोगों को आते आरी ले कर
मातम पसरा है तब से इन चिड़ीयों में

सच्चे लोगों में कड़वाहट मिलती है
मीठापन मिलता है अक्सर झूठों में ।

तेरी सूरत, वो लम्हे और कुछ यादें
बाक़ी है अब भी इस दिल के टुकड़ों में

राजीव कुमार

तेरी आंखों ने जब सियासत की

मतला

तेरी आंखों ने जब सियासत की
जान हमने भी तब हिमाकत की

आप से इक दफा मुहब्बत की
उम्र भर हमने फिर इबादत की

मैने ख्वाबों के इक तलातुम से
अपनी आंखों की भी हिफाजत की

दुश्मनी हो गयी जमाने से
हमने जो आप से मुहब्बत की

चांदनी आज फिर नहीं आई
किसने फिर आज भी शरारत की

राजीव कुमार
शुभ रात्री

Wednesday, July 12, 2017

फूल तितली बहार और चमन

दर्द को आपने जिया ही नहीं 
इश्क फिर आप को हुआ ही नहीं

फूल तितली बहार और चमन
तुझसे अच्छा कोई बना ही नहीं

बात करती हैं आप की आंखे।
आप ने ठीक से सुना ही नहीं

क्यु जमाने से लड़ रहा है तू
 खुद से लड़ के जीतता ही नही

रोज हस कर तो बात करता था
अब मगर मुझसे बोलता ही नही

कितनी नदियों को पी गया लेकिन
कैसा सागर है जो भरा ही नही

फिक्र जिसकी हमारे जैसी हो
ऐसे दुनियां में शायरा ही नहीं

हमने देखा है यार उल्फत में
जिसको चाहा वही मिला ही नही

सारी दुनिया जो घूमता है वो
अपने भीतर कभी गया ही नही

किस तरह दिल तुम्हारा बहलेगा
ऐसा नुस्खा मुझे पता ही नही

राजीव

Tuesday, July 11, 2017

आग पानी जमीं और हवा कौन है

कुछ शेर

आग पानी जमीं और हवा कौन है
है कोई जो बता दे खुदा कौन है

नीली साड़ी समन्दर की पहने हुए।
सच बता खूबसूरत धरा कौन है

धरा -धरती

शक्ल सूरत तेरी है गजल की तरह
अब तिरे सामने आईना कौन है

एक दिन खुद ब खुद तू समझ जायेगा
क्या बताउं तुझे तू मिरा कौन है

देख कर मुझको पहली दफा आपने
सबसे बोला था ये सरफिरा कौन है

यूं तो रिस्वत जहां में बुरी बात है
पर मिले तो यहां छोड़ता कौन है

हादसे की तरह एक दम हू ब हू
ये मिरे पास आता हुआ कौन है

राजीव

Saturday, July 8, 2017

रूह को जिस्म के सांचे में बिठा रक्खा है
और इन्सान को मिट्टी का बना रक्खा है

अपनी आंखों में जिसे हमने छुपा रक्खा है
हाय उसने ही हमे खुद से जुदा रक्खा है

जेब खाली हैं मगर दोनो जहां है जिसमें
हमने सीने में उसी दिल को छुपा रक्खा है

आप इक बार तो मांगो न मेरी जां हस के
जान दे देगे कि इस जान में क्या रक्खा है

चाहने वाले बहुत लोग मिरे हैं लेकिन
खुद को तेरे लिये दुनियां से बचा रक्खा है।

राजीव कुमार

रोजगारी भी मियां अब दर्दे सर होने को है

ग़ज़ल

रोजगारी भी मियां अब दर्दे सर होने को है
मेरा मतलब जिस्त अपनी दर ब दर होने को है

अपनी मायूसी छुपाने अब कहां जायेगे हम
ये मकाने दिल तो अपना खण्डहर होने को है

बर्फ यादों की तेरी पिघला गयीं तन्हाईयां
अब शुरू आंखो से दरिया का सफर होने को है

आप ने हमको कहा हम भूल जायें आप को
ऐसा लगता है ये किस्सा मुक्तसर होने को है

रास्ते हैं ठोकरें है और हैं कुछ मंजिले
राम जाने कौन अपना हमसफर होने को है ।

कब तलक सोये रहोगे अब तो उठ जाओ मियां
देख लो अब तो सुबह भी दोपहर होने को है

राजीव कुमार

Wednesday, July 5, 2017

पता चला ही नहीं कब जिगर से निकला था

पता चला ही नहीं कब जिगर से निकला था
मगर कोई तो मेरे चश्मे-तर से निकला था

हजूमे गम जो दिले बे असर से निकला था
न जाने कौन कहां कब किधर से निकला था

जिधर मेरी नजर नहीं थी हां उधर से ही।
वो साथ छोड़ के मेरा सफर से निकला था

अगर मै लौट के आया तो फिर बताउंगा
किसे तलाशने मैं भी सहर से निकला था

मिरे खिलाफ मेरा अक्स है खड़ा तब से
के जब से आईना मेरी नजर से निकला था

नहा के धूप में आई सूखाने बाल वो जब।
ख़बर उड़ी कि क़मर दोपहर से निकला था।

जला रही है मेरी आशिकी ग़ज़ल की लौ
या फिर ख़्याल ही मेरा श़रर से निकला था ।

उरूज ओ बह्र की नजरों से हो गया खारिज
हर एक शेर जो मेरे जिगर से निकला था

राजीव कुमार

चश्मे-तर - नम आंखें
सहर -- सुबह
अक्स -- प्रतिबिम्ब
क़मर-- चांद
श़रर-- चिंगारी

Tuesday, July 4, 2017

फूल के ही साथ देखो खार है

फूल के ही साथ देखो खार है
गर समझिये तो यही संसार है

गर यही दौरे तरक्की है तो क्युं
हर किसी के हाथ में तलवार है

जिन्दगी भर क्या कमाया सोचिये
मौत के आगे तो सब बेकार है

नेक नीयत आदमीयत छोड़ कर
जहनियत से आदमी बीमार है

खुदकुशी का रोक दे जो सिलसिला
हां किसानो की वही सरकार है।

राजीव कुमार 

मुझको जो तेरी नजर ए इनायत नहीं मिलती

ग़ज़ल

हर इक को इस जहां में महब्बत नहीं मिलती।
खैरात में इतनी बड़ी दौलत नहीं मिलती।

अपने लिये हर शख़्स परेशान है मगर।
औरों से कभी इसकी तबीयत नहीं मिलती।

तस्वीरे मुल्क तुम जो अभी देख रहे हो
अच्छे दिनों से इसकी भी सूरत नहीं मिलती

मेरे अजीज दोस्त मिरे हाल पर न जा।
गुर्बत में किसी शख़्स से किस्मत नहीं मिलती

अच्छा हूं बुरा हूं ये मेरी जाती बात है।
रहने दे तुझसे मेरी तबीयत नहीं मिलती

यूं तो जनाब आप की भी उम्र हो गयी ।
इस उम्र में अब हुस्न की दौलत नहीं मिलती

कितना अजीब शह्र है कि दिन में भी यहां।
हमको शरीफ शख़्स की रगबत नहीं मिलती।

राजीव कुमार

Sunday, July 2, 2017

जात मजहब की खातिर न तूफान कर।

जात  मजहब  की  खातिर न तूफान कर।
खुद भी  इन्सान बन  मुझको इन्सान कर।

जिस  जमीं  पर   बसा  है  ये सारा  जहां।
उसकी  मिट्टी  का  थोड़ा तो सम्मान कर।

मयकदे  में  अगर   तुझको   आना है  तो
दफ्न  मिट्टी  में  तू  दीन  ओ  ईमान  कर

गर  मेरी  बेखुदी  से   सिकायत   है  तो।
मुझको काफिर बता मुझ पे अहसान कर।

उम्र   भर   बैठ    कर    तन्हा   रोयेगा  तू।
दिल  की  दुनिया  को  ऐसे न  वीरान कर।

बेदिली     बुजदिली      बेहयाई      जफा।
अपने   भीतर   से   बाहर  ये  सामान कर।

कौन  दिल से  जुड़ा  कौन  मतलब  से  है।
दोस्त  बनने  से  पहले  ये   पहचान    कर।

आज   बाजार   में   दिल   लिये   हूं  खड़ा।
यार   बोली    लगा   मत    परेशान    कर।

इश्क  और  जंग  मे  सब  है  जायज  यहां।
दिल  के  मैदान  पर कुछ  तो  ऐलान  कर।

बंदगी   शायरी    आशिकी     क्या     करूं।
ए  खुदा  जिस्त   थोड़ी   तो   आसान   कर।

राजीव कुमार

आईने के लिये इक आईना जरूरी है

आईने के लिये इक आईना जरूरी है
यार ऐसा है जहां में खुदा जरूरी है

आसमां सर पे उठाने से कुछ नहीं होगा।
बात करने के लिये कायदा जरूरी है

सारे अरमान सभी ख़वाब लग गये बोलो
घर बनाने के लिये और क्या जरूरी है

उम्र भर गम है उठाना इसी लिये शायद
गम भुलाने के लिये मयकदा जरूरी है

दर्द के बाद सफर का मजा भी आयेगा
चलते कदमों के लिये आबला जरूरी है

अबके बारिस में ये महसूस हो रहा है के।
सर्द मौसम में कोई हमनवा जरूरी है

राजीव कुमार

Sunday, June 25, 2017

आप से मेरी दोस्ती होती

ग़ज़ल

आप से मेरी दोस्ती होती
दुश्मनी मुंह छुपा रही होती

कुछ दुआओ में भी असर होता
इक दफा आपने तो दी होती

आईना घूरता नहीं यूं ही।
आप में गर नहीं कमी होती

आग पानी हवा जमीं अम्बर
कुल मिला कर है जिन्दगी होती

अब न गांधी रहे न ही गौतम
काश फिर वैसी सादगी होती

हमसे सुनते सूनाते कुछ अपनी
तो ग़ज़ल भी गजल हुई होती

राजीव कुमार
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फिलबदीह ग़ज़ल मुहब्बत के नाम
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गम न होता न ही खुशी होती
तू न मुझसे अगर मिली होती

तेरी यादों से शायरी होती
तू जो होती गजल हुई होती

हाय कितना हसीन मौसम है
जानेमन तू भी आ गयी होती

ये खिज़ा भी बहार हो जाती
तेरी खुश्बू अगर उड़ी होती

महजबीनो से दूर रहता तो
दिल की दुनियां नहीं बसी होती

मयकदा गम मिटा नहीं पाता
गर तू साकी नहीं बनी होती

मेरे दिलवर मिरे ख्यालों में
तू न होता तो तीरगी होती

मर गया या के मरने वाला हूं
ये खबर उनको हो गयी होती

राजीव कुमार


केकरा से प्यार कर लीं केकरा के छोड़ दीं।

भोजपुरी ग़ज़ल

केकरा से प्यार कर लीं केकरा के छोड़ दीं।
तोहरे खुशी के खातिर दुनिया के छोड़ दीं।

अब केहू और तोहरे दिल में त नइखे रहत।
क ह त  तोहरे  दिल के कमरा के छोड़ दीं।

दुनिया में  भाई  भाई  से  अब  डेरात बाटे।
छोटका   इहे  बा चाहत बड़का के छोड़ दीं।

मां  बाप   बेटा बेटी    सभे  खुशी  से  रही ।
रउआ  शराब  सिगरेट  गुटका  के छोड़ दीं।

क ह तरू तू   माई बबुआ  के  छोड़  द  त।
सो च तनी कि हम अब तोहरा के छोड़ दीं।

राजीव कुमार

Friday, June 23, 2017

तू हमार परछाई हउ

दिल के दर्द दवाई हउ
तू हमार परछाई हउ

लईका कहे सन कालेज के
तू त लक्ष्मी बाई हउ

पहिले कटरीना रहलू अब
दू लईका के माई हउ

शादी कइले बाड़ू जबसे
तब से तू भोजाई हउ

हमरे खातिर त तू जैसे
हारल एक लड़ाई हउ

राजीव 😍

जेकरा भीतर डर बइठल बा

भोजपूरी ग़ज़ल

जेकरा भीतर डर  बइठल बा
नेवा के ऊहे सर  बइठल बा 

ए धरती के ऊपर कब से
दे खअ ना अम्बर बइठल बा

के का करी देश के खातिर
सब केहू जब घर बइठल बा

हमरे भीतर  के ऊ लईका
आजो ले ममहर बइठलबा

ए बाबू हम्मन के किस्मत
जाने कौन शहर बइठल बा

महल में तू त बा ड़ लेकिन 
लोग इहां बेघर बइठल बा 

दू कौङी के जान के खातिर
खोल के ऊ दफ्तर बइठल बा 

जनता से ज्यादा इहवा के 
अतना ताकतवर बइठल बा?

राजीव कुमार

जमीने दिल की तपन में है कौन तुम हो क्या

ग़ज़ल 

जमीने दिल की तपन में है कौन तुम हो क्या
सूकून चैनो अमन में है कौन तुम हो क्या

ग़ज़ल का आज जमाना मूरीद है कितना ।
तमाम शेरो सुखन में है कौन तुम हो क्या।

न जाने कब से नहीं सोई हैं ये आंखें भी।
ख्याले हिज्रे चुभन में है कौन तुम हो क्या।

गुलों में रंग हवाओं में खुश्बुओं का घर ।
हरेक घर के चमन में है कौन तुम हो क्या।

बदन पे रौशनी लेकर निकलते है घर से
ये जुगनुओं की थकन में है कौन तुम हो क्या

मिरे लबों से हमेशा ही सच निकलता है
मिरी जुबां के वतन में है कौन तुम हो क्या

खुदा से जब भी मिलुंगा तो मै ये पूछूंगा
जमीं पे और गगन में है कौन तुम हो क्या।

राजीव कुमार

फूल के ही साथ देखो खार है

फूल के ही साथ देखो खार है
गर समझिये तो यही संसार है

गर यही दौरे तरक्की है तो क्युं
हर किसी के हाथ में तलवार है

नेक नीयत आदमीयत छोड़ कर
जहनियत से आदमी बीमार है

जिन्दगी भर जो कमाया आपने
मौत के आगे वो सब बेकार है।

खुदकुशी का रोक दे जो सिलसिला
हां किसानो की वही सरकार है।

राजीव कुमार

Tuesday, June 20, 2017

आशिकी का खुमार निकलेगा

मतला

आशिकी का खुमार निकलेगा
आज दिल का गुबार निकलेगा

सामने आज वो भी बैठी है
शेर से आबशार निकलेगा

गौर से देखिये जमाने को
हर कोई दागदार निकलेगा

दर्द महसूस होगा दिल से जब
ये गमे नागवार निकलेगा

मेरी आंखों से आप का चेहरा
करके अब बेकरार निकलेगा

झूठ को सच बताने वाला अब
देखना पत्रकार निकलेगा

इश्क तेरा भी इक जनाजे सा
एक दिन शानदार निकलेगा

राजीव कुमार

जिसे मिट्टी कहा तुमने वो मेरी मां के जैसी है।

ग़ज़ल

जिसे  मिट्टी  कहा तुमने  वो मेरी मां के जैसी है।
मैं इसके लब पे रहता हूं ये मेरे दिल में रहती है।

अभी तक  गर्दीशों में  थे  सितारे मैं  अकेला था।
मिली जब कामयाबी तब लगा वो भी अकेली है।

पढ़े लिक्खो की दुनियां के उसूलों को समझ लीजे।
नहीं ली आपने रिस्वत तो फिर क्या खाक डिग्री है।

उगाते  हैं  जो  खेतों में   वतन की जिन्दगी यारों ।
उन्ही लोगों ने ही इस दौर में क्यु खुदकुशी की है।

जिसे  देखो  वही    मजबूर है  बेबस  है  बेचारा ।
वो जिसके दम से सबकी मेज पर थाली है रोटी है।

सियासी लोग  अच्छे दिन के दावे कर रहें हैं पर।
अभी तक  मसअला  रोटी कमाई जिन्दगी ही है।

राजीव कुमार

Monday, June 12, 2017

इश्क जैसा बुखार पहली बार।

फिलबदीह ग़ज़ल DrMustfa Mahir  साहब के दिये मिसरे पर

इश्क जैसा बुखार पहली बार।
सर पे अब है सवार पहली बार।

ऐसा लगता है अब मिरे दिल पर।
चड़ गया है खुमार पहली बार।

देख कर तुझको खो रहा हूं मैं।
खुद पे अब इख्तेयार पहली बार।

दिल की दुनिंया में हो गयी हलचल।
जब हुआ बेकरार पहली बार ।

आप आये थे जब हमारे घर।
आयी थी तब बहार पहली बार।

जिन्दगी थी मिली फजांओं को ।
आप के दम से यार पहली बार ।

याद आयी तेरी तो आखो से।
बह गयी मय की धार पहली बार।

जिन्दगी भर नही चुका पाया ।
जो बना कर्जदार पहली बार।

नाम राजीव है मिरा लेकिन ।
उसने बोला कुमार पहली बार।


  • राजीव कुमार

Friday, June 9, 2017

कभी मुझसे मेरी बन कर मिलोगी

कभी मुझसे मेरी बन कर मिलोगी
मेरी जां खुद ब खुद सब कुछ कहोगी

बहुत कुछ कहना सुनना चाहता था
मगर डरता था क्या तुम सुन सकोगी

न रोको खुद को आने से वगरना
मुझे ख्वाबो में तुम ही तुम दिखोगी

अधूरी तुम अधूरा मैं हूं लेकिन ।
जियुंगा जब तलक तुम भी जियोगी ।

मेरी दीवानगी को याद रखना ।
मेरे जैसी ही इक दिन तुम बनोगी।

राजीव कुमार

Saturday, June 3, 2017

दिल की दीवारों के पत्थर तुड़वा दो।

ग़ज़ल कुछ नये अन्दाज में

दिल की दीवारों के पत्थर तुड़वा दो।
या इन दीवारों में हमको चुनवा दो।

अब तक तो आसान हमारा जीना था।
अच्छा है अब थोड़ी मुश्किल करवा दो।

अपने हाथो खुद को मार नहीं सकते ।
ऐसा कर लो तुम ही हमको मरवा दो।

कितना ऊपर उड़ सकता हूं देखोगे।
लेकिन पहले पर तो मेरे कटवा दो ।

भीतर का क़िरदार तुम्हारा मालुम है।
ये दीनो ईमान के पर्दे हटवा दो ।

दिल की बस्ती दिल दुनिया इश्क मेरा।
ये लो ले जाओ इन सब को जलवा दो ।

राजीव कुमार

Wednesday, May 31, 2017

कभी चाहा नहीं हमने कि हेमा मिल गयी होती ।

पेशे खिद़मत है कुछ नये अंदाज में ।
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कभी चाहा नहीं हमने कि हेमा मिल गयी होती ।
बस इतना चाहते थे हम कि विद्या मिल गयी होती।
(हेमा-पृथ्वी   विद्या- शिक्षा)

कई सागर इन आंखों में लिये फिरते तो हैं लेकिन ।
हमारी प्यास मिट जाती जो सरिता मिल गयी होती ।

अंधेरा सारी दुनियां से मिटा देता मैं इक पल में ।
अगर मुझको मेरे भीतर की दीपा मिल गयी होती।

मेरा घर भी किसी मंदिर के मानिंद हो गया होता।
अनुष्का बन के गर मुझको तनूजा मिल गयी होती ।
(मानिंद - की तरह , अनुष्का - दुर्गा स्वरूप , तनूजा - बेटी )

बहुत से लोग धरती पर कभी भूखे नहीं रहते।
जो खेतों और खलिहानों को बरखा मिल गयी होती।
(बरखा - बारिश)

हर इक इन्सान अपनी जात से बाहर निकल जाता ।
अगर दुनिया को खुशियों की मनीषा मिल गयी होती।
(मनीषा - इच्छा )

जगाने हर सुब्ह मुझको चली आती जो बागो में ।
मुझे गर सारिका बन कर प्रियंका मिल गयी होती।
(सारिका -कोयल, प्रियंका - सून्दर स्त्री )

राजीव कुमार

Sunday, May 28, 2017

खानाबदोश दिल का ठिकाना इधर उधर।

ग़ज़ल

खानाबदोश दिल का ठिकाना इधर उधर।
अच्छा है यार दिल का लगाना इधर उधर

तुम झूठ बोलने का मजा उनसे पूछना
आता है जिनको बात घुमाना इधर  उधर ।

पहले ही जल रहे हैं शह़र के शह़र यहां ।
अब छोड़िये भी आग लगाना इधर उधर

ए जान आप अपनी नजर पर नजर रखो
अच्छा नहीं नजर का मिलाना इधर उधर

अपने ख़याल अपनी ज़बां अपनी फ़िक्र का
मैं भी लुटा रहा हूँ ख़ज़ाना इधर उधर

महफिल है शायरों की जरा दिल से बैठना।
आ कर नहीं है आपको जाना इधर उधर

ये चार दिन की जिन्दगी भी जिन्दगी है क्या ।
देखो भटक रहा है जमाना इधर उधर

अपने बदन का बोझ उठाना है इस लिये ।
हमको भी पड़ रहा है कमाना इधर उधर

राजीव कुमार

दिल की दुनियां में हर पल खुशी के लिये

दिल की दुनियां में हर पल खुशी के लिये
शायरी कीजिये जिन्दगी के लिये

हद से ज्यादा सराफत भी अच्छी नहीं
आज के दौर में आदमी के लिये।

सोने चांदी नहीं हीरे मोती नहीं ।
हम तो आये हैं तेरी खुशी के लिये ।

दिल तड़पता रहे आंख बहती रहे।
ये भी अच्छा नहीं आशिकी के लिये

फूल खिलने लगे और महकने लगे
गा रही है फजा आप ही के लिये

चांद भी सोचता रह गया रात भर
आपका है या है चांदनी के लिये

पीठ पर हम भी खंजर संम्भाले हुए
मर गये दोस्तो दोस्ती के लिये

हम फकीरों का दौलत से क्या वास्ता
हम तो जीते ही हैं मुफलिसी के लिये

आईये हमसे सिकवे गिले कीजिये
हम तो काबिल नहीं दुश्मनी के लिये

रौशनी की हिमायत में मत भूलिये
रौशनी भी तो है तीरगी के लिये

शाम के सात अब बज गये देखिये
आईये अब चले मय कसी के लिये

राजीव कुमार
🙏🏻

Friday, May 26, 2017

आप की दी हुई सजाओं से

ग़ज़ल

आप की दी हुई सजाओं से
कौन डरता है अब गुनाहों से।

टूट जाना ही आशिकी है तो
हमको लेना है क्या वफाओं से

मंजिलें उनको ही हुई हासिल
रुक न पाये जो आबलाओं से।

दर्दे उल्फत भी दर्द ऐसा है
खत्म होता नहीं दवाओं से।

ये दिया दिल का बुझ न पायेगा
सहमी सहमी हुई हवाओं से।

ऐ खुदा तू ही अब बचायेगा
हमको इस दौर के खुदाओं से।

राजीव

Thursday, May 25, 2017

तू जो साकी मेरा नहीं होता

तू जो साकी मेरा नहीं होता
मैं भी मयकस बना नहीं होता

दिल के अरमान जल रहे होते
सच कहुं गर दिया नहीं होता ।

ये गमे दिल ये शब ये तन्हाई।
आज कल कुछ नया नहीं होता

जंग में फिर भी कुछ तो शर्ते हैं
इश्क में देख क्या नहीं होता ।

ये लो अखबार तो पढ़ो राजीव
झूठ से सच बड़ा नहीं होता ।

राजीव कुमार

🙏🏻🙏🏻

यहाँ तुम और हम उलझे हुए हैं।

ग़ज़ल

यहाँ तुम और हम उलझे हुए हैं।
कि जैसे दो क़दम उलझे हुए हैं।

मेरे दिल की हज़ारों धड़कनों में।
ज़माने भर के ग़म उलझे हुए हैं।

निकलना चाहते हैं खुद से बाहर ।
मगर हम दम ब दम उलझे हुए हैं।

तरक़्क़ी की नुमाइश हो रही है।
मगर दैरो-हरम उलझे हुए हैं।

ये जज़्बा ए मुहब्बत है कि हमसे।
सितमगर और सितम उलझे हुए हैं।

हयातो हश्र की दुनिया में यारों।
बहुत से पेंचो खम उलझे हुए हैं।

उधर एहसास घुटकर चीखते हैं।
इधर लफ़्ज़ों में हम उलझे हुए हैं।

राजीव कुमार

Wednesday, May 17, 2017

कैसा गुजरा ये साल मत पूछो

कैसा गुजरा ये साल मत पूछो
हम फकीरों का हाल मत पूछो

आप जो बोल दो वही सच है।
आप हमसे सवाल मत पूछो।

यार जन्नत से आ रहा हूं मैं
कैसे था नैनीताल मत पूछो

राजीव कुमार

दर्द जाये न शायरी जाये

बस यूं ही

दर्द जाये न शायरी जाये
जान जाती है तो चली जाये

दर्द को देख कर हसी आये
जिन्दगी इस तरह भी जी जाये

अब दिये इल्म के भी हों रौशन
अब दिलों से भी तीरगी जाये

सबके दिल को जबान दे मौला
ताकी दिल की भी अब कही जाये

अपने बेटे के फिक्र में अम्मी
देखो सरहद पे न चली जाये

आप ने एक न सुनी मेरी
क्यु भला आप की सुनी जाये

राजीव कुमार

दरिया सागर सहरा अम्बर क्या क्या है।

ताजा गज़ल

दरिया सागर सहरा अम्बर क्या क्या है।

क्या बोलूं इस दिल के अन्दर क्या क्या है।

जब तक दुनियां है और दुनियादारी है।

मत पूछो दुनियां में बेहतर क्या क्या है।

कत्लो गारत झूठ ओ नफरत मक्कारी ।

अखबारों को देखो पढ कर क्या क्या है।

इक दो दिन ईमान रखो फिर समझोगे।

रोटी चावल दाल मयस्सर क्या क्या है।

इश्क की बातें हम से पूछ रहें हैं क्युं।

आखिर आपके दिल के भीतर क्या क्या है ।

उनका चेहरा उनकी आंखें और दो लब।

चाकू छूरी नश्तर खंजर क्या क्या है ।

आप की खातिर आप का राजीव देखो तो ।

आशिक पागल प्रेमी शायर क्या क्या है।

राजीव कुमार

इश्क अकीदत दाम दिरम यारी का किस्सा

इश्क अकीदत दाम दिरम यारी का किस्सा।
यही है दुनियाभर की बीमारी का किस्सा ।

आग का मौसम आग की बारिस और मिरा घर।
किसे सुनाउं अपनी दुश्वारी  का किस्सा।

कहीं था रस्ता कहीं थी मंजिल और कहीं मैं
छोड़ो भी अब ऐसी लाचारी का किस्सा

मौत मुकर्रर जिस्त मुसीबत क्या अच्छा है।
मुझे पता है इस दुनियादारी का किस्सा।

मुल्क तरक्की के रस्ते है और नौजवां ।
बता रहा है अपनी बेकारी का किस्सा ।

गहरा सागर टूटी किश्ती दूर है साहिल ।
कौन सुनेगा  जंग की तैयारी का किस्सा।

खुद से जीतूं खुद को हारूं सोच रहा हूं ।
यही है मेरी मुझसे गद्दारी का किस्सा ।

राजीव कुमार

दाम दिरम -रुपया पैसा

जम्हूरीयत के नाम पे कुछ ऐसा हुआ है ।

जम्हूरीयत के नाम पे कुछ ऐसा हुआ है ।
बच्चा बड़ा बूड़ा हर एक सहमा हुआ है।

बन्दूक की गोली तो आ पहुंची है घर तलक।
सरहद की सियासत में मुल्क उलझा हुआ है।

पत्थर लिये सड़क पे आ गयी है अब अवाम।
अपना निजाम अब भी मगर सोया हुआ है।

अपने ही लोग अपनो की कब्रें रहे हैं खोद।
दुश्मन जो था वो चैन से अब बैठा हुआ है।

हर रोज अम्न के जहां उठते हैं जनाजे ।
उस सर जमीं पे किसका अलम फहरा हुआ है।

घर लौट के आते हैं तो मां पूछती है अब
बेटा तू तिरंगे से ही क्युं लिपटा हुआ है।

कश्मीर का जन्नत से जहन्नुम के सफर पर ।
क्या और कहुं पहले ही सब लिक्खा हुआ है।

राजीव कुमार

अलम -- झंण्डा

बुरी आदत से मुक्ती मिल गयी तो !

गजल 😂😂😂😂

बुरी आदत से मुक्ती मिल गयी तो !
तेरी यादों से छुट्टी मिल गयी तो !

बहुत चाहा कि तुझको खत लिखूं पर
तेरे बापू को चिट्ठी मिल गयी तो !

मुझे तड़पाने वाली क्या करेगी !
मुझे तुझसे भी अच्छी मिल गयी तो !

मियां बच्चो की फिर किसको जरूरत
अगर बीवी ही छोटी मिल गयी तो !

नहीं देती है अब ससूराल जाने
उसे डर है कि साली मिल गयी तो!

मेरा ईमान तो पक्का है लेकिन
कहीं नोटो की गड्डी मिल गयी तो !

मिलेगी हर किसी को मुफ्त बोतल
अगर इस बार कुर्सी मिल गयी तो !

राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...