Friday, May 26, 2017

आप की दी हुई सजाओं से

ग़ज़ल

आप की दी हुई सजाओं से
कौन डरता है अब गुनाहों से।

टूट जाना ही आशिकी है तो
हमको लेना है क्या वफाओं से

मंजिलें उनको ही हुई हासिल
रुक न पाये जो आबलाओं से।

दर्दे उल्फत भी दर्द ऐसा है
खत्म होता नहीं दवाओं से।

ये दिया दिल का बुझ न पायेगा
सहमी सहमी हुई हवाओं से।

ऐ खुदा तू ही अब बचायेगा
हमको इस दौर के खुदाओं से।

राजीव

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