ग़ज़ल
आप की दी हुई सजाओं से
कौन डरता है अब गुनाहों से।
टूट जाना ही आशिकी है तो
हमको लेना है क्या वफाओं से
मंजिलें उनको ही हुई हासिल
रुक न पाये जो आबलाओं से।
दर्दे उल्फत भी दर्द ऐसा है
खत्म होता नहीं दवाओं से।
ये दिया दिल का बुझ न पायेगा
सहमी सहमी हुई हवाओं से।
ऐ खुदा तू ही अब बचायेगा
हमको इस दौर के खुदाओं से।
राजीव
आप की दी हुई सजाओं से
कौन डरता है अब गुनाहों से।
टूट जाना ही आशिकी है तो
हमको लेना है क्या वफाओं से
मंजिलें उनको ही हुई हासिल
रुक न पाये जो आबलाओं से।
दर्दे उल्फत भी दर्द ऐसा है
खत्म होता नहीं दवाओं से।
ये दिया दिल का बुझ न पायेगा
सहमी सहमी हुई हवाओं से।
ऐ खुदा तू ही अब बचायेगा
हमको इस दौर के खुदाओं से।
राजीव
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