पता चला ही नहीं कब जिगर से निकला था
मगर कोई तो मेरे चश्मे-तर से निकला था
हजूमे गम जो दिले बे असर से निकला था
न जाने कौन कहां कब किधर से निकला था
जिधर मेरी नजर नहीं थी हां उधर से ही।
वो साथ छोड़ के मेरा सफर से निकला था
अगर मै लौट के आया तो फिर बताउंगा
किसे तलाशने मैं भी सहर से निकला था
मिरे खिलाफ मेरा अक्स है खड़ा तब से
के जब से आईना मेरी नजर से निकला था
नहा के धूप में आई सूखाने बाल वो जब।
ख़बर उड़ी कि क़मर दोपहर से निकला था।
जला रही है मेरी आशिकी ग़ज़ल की लौ
या फिर ख़्याल ही मेरा श़रर से निकला था ।
उरूज ओ बह्र की नजरों से हो गया खारिज
हर एक शेर जो मेरे जिगर से निकला था
राजीव कुमार
चश्मे-तर - नम आंखें
सहर -- सुबह
अक्स -- प्रतिबिम्ब
क़मर-- चांद
श़रर-- चिंगारी
मगर कोई तो मेरे चश्मे-तर से निकला था
हजूमे गम जो दिले बे असर से निकला था
न जाने कौन कहां कब किधर से निकला था
जिधर मेरी नजर नहीं थी हां उधर से ही।
वो साथ छोड़ के मेरा सफर से निकला था
अगर मै लौट के आया तो फिर बताउंगा
किसे तलाशने मैं भी सहर से निकला था
मिरे खिलाफ मेरा अक्स है खड़ा तब से
के जब से आईना मेरी नजर से निकला था
नहा के धूप में आई सूखाने बाल वो जब।
ख़बर उड़ी कि क़मर दोपहर से निकला था।
जला रही है मेरी आशिकी ग़ज़ल की लौ
या फिर ख़्याल ही मेरा श़रर से निकला था ।
उरूज ओ बह्र की नजरों से हो गया खारिज
हर एक शेर जो मेरे जिगर से निकला था
राजीव कुमार
चश्मे-तर - नम आंखें
सहर -- सुबह
अक्स -- प्रतिबिम्ब
क़मर-- चांद
श़रर-- चिंगारी
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