Sunday, August 27, 2017

मुल्क की हूकूमत को कुर्सीयां समझतीं हैं।

गजल-1

मुल्क की हूकूमत को कुर्सीयां समझतीं हैं।
हम अवाम हैं हमको सिसकियां समझतीं हैं

शह्र के खुदाओं ने आग क्युं लगायी है
खाक हो गयी हैं जो बस्तीयां समझतीं हैं

हर तरफ तबाही का ये हजूम कैसा है।
उठ रही किसानों की अर्थीयां समझतीं हैं

आप का महल वो जो हाथ से बनाते है
उन गरीब लोगों को झुग्गीयां समझतीं हैं

आज एक इन्सां जो आप का मसीहा है।
आप तो नहीं उसको लड़कियां समझतीं हैं।

राजीव कुमार

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