Monday, May 27, 2019

सच कहूँ किस ख़ुशी से रौशन है।

ग़ज़ल

सच कहूँ किस ख़ुशी से रौशन है।
दिल तेरी आशिकी से रौशन है।

उसकी दीवानगी से मैं और वो।
मेरी दीवानगी से रौशन है।

ज़िन्दगी जुगनुओं की देखो तो।
अस्ल मे तीरगी से रौशन है।

पहले रौशन थी अपनी रंगत से।
अब मेरी शाइरी से रौशन है।

जो पहनना हो वो पहन लो पर।
हुस्न तो सादगी से रौशन है।

दोस्त चाहत का ये  समंदर भी।
हर तरफ तिश्नगी से रौशन है।

तेरी तस्वीर तेरा खत और मैं।
आज हर शय तुझी से रौशन है।

अच्छा लगता है जान कर मुझको
तेरी दुनिया मुझी से रौशन है

मैं जहाँ से हूँ वो शह्र यारों।
माँ सरीखी नदी से रौशन है।

राजीव कुमार

Sunday, May 26, 2019

दुनिया के इम्तिहान से डर जाऊँ क्या करूँ।

ग़ज़ल

दुनिया के इम्तिहान से डर जाऊँ क्या करूँ।
अपना ज़मीर बेच दूँ ? मर जाऊँ क्या करूँ।

कब तक लड़ूँगा अपने ही लोगों से रात दिन।
दिल पर ये बोझ ले के किधर जाऊँ क्या करूँ।

मुश्किल मेरे लिये है मुहब्बत में आप के ।
हद में रहूँ या हद से गुज़र जाऊँ क्या करूँ ।

नज़रों से अब गिरा ही दिया है तो बोल दो ।
दिल से भी मैं तुम्हारे उतर जाऊँ क्या करूँ

कुछ भी नहीं बचा है गमे हिज्र के सिवा ।
मैं टूट जाऊँ या के बिखर जाऊँ क्या करूँ

मंजिल भी पा गया तो अकेले करूंगा क्या।
जारी रखूँ सफ़र के ठहर जाऊँ क्या करूँ।

अब सोचने लगा हूँ मुहब्बत के नशे में ।
डूबा रहूँ या फिर से उबर जाऊँ क्या करूँ

राजीव कुमार

घरों से आ के बाहर बोल उट्ठे ।

ग़ज़ल

थे  जो  खामोश  वो सर बोल उट्ठे।
घरों  से  आ के  बाहर  बोल उट्ठे ।

सुबह  होते  ही  आंगन  के  परिंदे।
हमारी  छत पे  आ  कर  बोल उट्ठे।

तड़पते  देख कर प्यासा जमीं को।
ये सब बादल के लश्कर बोल उट्ठे।

कहाँ रहती है वो ख़्वाबों की रानी।
बस इतना सुन के पत्थर बोल उट्ठे।

किया एलान हमने इश्क़ का जब।
ज़माने  भर  के  खंजर  बोल उट्ठे।

जरूरत   से    ज्यादा  फैलते  ही।
मेरे    पैरों   से   चादर  बोल  उट्ठे।

फक़त इन्सान की है शक़्ल लेकिन।
मेरे  भाई  हैं   अजगर   बोल  उट्ठे।

हुकूमत आ के  लेटेगी  सड़क पर।
किसी दिन  गर ये  बेघर बोल उट्ठे।

राजीव कुमार

सच ये है कि जहां में दुआ के बग़ैर भी।

ग़ज़ल

सच ये है कि जहां में दुआ के बग़ैर भी।
ज़िन्दा हैं कुछ मरीज शिफा के बग़ैर भी

ऐसा नहीं कि मर गये हैं आप के बिना।
हम लोग जी रहे हैंं ख़ुदा के बग़ैर भी।

ख़तरा भी है उसी से ज़रूरी भी वही है
जलता नहीं चिराग़ हवा के बग़ैर भी

चलते हैं नैनीताल वहाँ दोस्त इन दिनों
बरसात हो रही है घटा के बग़ैर भी

उस शख़्स से सवाल भला कौन करेगा।
जिसको सज़ा मिली है ख़ता के बग़ैर भी

अब कुछ नहीं बचा है मुहब्बत में दोस्तों
अब इश्क़ हो रहा है वफ़ा के बग़ैर भी

राजीव कुमार

Monday, May 13, 2019

मुद्दे की बात ये है कि मुद्दा कोई नहीं।

ग़ज़ल

मुद्दे की बात ये है कि मुद्दा कोई नहीं।
हमको भी अब चुनाव की चिन्ता कोई नहीं।

उस दिन भी मरे भूख से वो कह रहे थे जब।
देखो मेरे निजाम में भूखा कोई नहीं

सर पे हर इक गरीब के छत देंगे इस दफा
वो कर रहा है जिसका भरोसा कोई नहीं

हम हैं तो सब हैं ठीक वगरना यहां पे तो।
हर आदमी ख़राब है अच्छा कोई नहीं

स्कूल अस्पताल खेत गांव जानवर
वाजिब है जो सवाल उठाता कोई नहीं

सूरत बदलने वाले बदलने लगे हैं नाम ।
हालात क्युं शहर के बदलता कोई नहीं

लोगों के मसअले हैं हुए जबसे दरकिनार
तब से किसी चुनाव में जीता कोई नहीं

राजीव कुमार
यू ट्यूब -- https://youtu.be/tueIBNZEW_U

Thursday, May 9, 2019

इससे पहले खाते धोखा छोड़ दिया।

ग़ज़ल

इससे   पहले  खाते  धोखा  छोड़ दिया।
प्यार  महब्बत  हमने करना छोड़ दिया।

इक  दूजे  के नाम  पे मरना छोड़  दिया।
यानी  अब  बेकार का रोना छोड़  दिया।

उस लङकी से प्यार निभाना मुश्किल है।
जिसने  हमको पकङा लूटा छोड़  दिया।

वहसत   उज़लत   नादानी  आवारापन।
देखो हमने सब कुछ अपना छोड़  दिया।

कोलेज  कैफ़े माल  सिनेमा  उसका घर।
वीरानों  में  और  भटकना  छोड़  दिया।

उन  आँखों  की  बात न  पूछो  जाने  दो।
जिन आँखो ने खुद को सूखा छोड़ दिया।

हमको  भी  आराम  मयस्सर  है  तब से।
जब  से हमने उनका सपना छोड़  दिया।

इक तितली इक फूल ये शबनम की बूंदें।
जाते  जाते  रात  ने   मक्ता  छोड़  दिया।

राजीव कुमार

Friday, May 3, 2019

ज़ीस्त बोतल शराब वाली है

ग़ज़ल

ज़ीस्त बोतल शराब वाली है ।
आधी बाक़ी है आधी ख़ाली है।

आँख काली है लब पे लाली है।
आपकी हर अदा निराली है।

जान तुम जानती नहीं तुमने ।
कितनी ग़ज़लों में जान डाली है।

इक तुम्हारा सूकून है वरना।
ये जो दुनिया है ये बवाली है।

उनको देखें तो ईद है अपनी।
वो भी देखें तो फिर दिवाली है।

जिस मुहल्ले में है तुम्हारा घर
वो हमारे लिये मनाली है

ज़ुल्फ, ख़ुशबू, लिबास और रंगत
जिस्म है गुल या गुल की डाली है

एक तन्हाई दूसरी सर्दी
कितनी बे-रहम रात साली है।

Jist botal sharab wali hai.
Adhi baki hai adhi khali hai.

Ankh kali hai lab pe lali hai.
Apki har ada nirali hai.

Jaan tum janti nahin tumne .
Kitni ghazlon main jaan dali hai.

Ek tumhara sukun hai warna.
Ye jo duniya hai ye bawali hai.

Unko dekhen to id hai apni.
Wo bhi dekhen to phir deewali hai

Jis mohalle main hai tumhara ghar.
Wo hamare liye manali hai

Julf khusbu libash or rangat
Jism hai gul ya gul ki dali hai

Ek tanhai dusari shardi
Kitni be raham raat sali hai.

राजीव कुमार

खुद को खुद ही उबार सकता हूं

ग़ज़ल

खुद को खुद ही उबार  सकता हूं
मैं हर इक शय नकार सकता हूं

बात ये है कि मरते मरते भी
अच्छे अच्छों को मार सकता हूं।

सिर्फ जुल्फ़ें नहीं तू चाहे तो।
तेरी क़िस्मत संवार सकता हूं।

यूं तो मुश्किल है पर तेरी ख़ातिर ।
जान ख़ुद को भी हार सकता हूं

तू भी सुनता नहीं मगर मौला।
मैं तुझे तो पुकार सकता हूं ।

राजीव कुमार

सच कहूँ गर तेरा पैगाम नहीं आएगा।

ग़ज़ल

सच कहूँ गर तेरा पैगाम नहीं आएगा।
नींद आ जायेगी आराम नहीं आएगा।

रंज शिकवा न वफ़ा इश्क़ न आँसू कोई।
बाद मेरे तेरे कुछ काम नहीं आएगा

लोग कहते हैं तेरे शह्र में ख़ुद ही चल कर।
ज़ह्र आ जायेगा पर जाम नहीं आएगा।

इस नये दौर की ग़ज़लों में नज़ाकत की जगह।
इक सिवा तेरे कोई नाम नहीं आएगा।

दर्द में आह में दुनिया में नशे में मुझमें
तेरा होना भी मेरे  काम नहीं आएगा

गर मेरे साथ चलोगी तो यकीं है मुझको
उम्र भर  गर्दिश ए अय्याम नहीं आएगा ।

हुस्न वालों को सहूलत है यही की उन पर ।
ज़ुर्म कर दें भी तो इल्ज़ाम नहीं आएगा।

आज तुम बेर लिए बैठी रहो शबरी जी
मुझको मालूम है अब राम नहीं आएगा

राजीव कुमार

ये हकीक़त है कि हर एक नहीं होता है

ग़ज़ल

ये हकीक़त है कि हर एक नहीं होता है
दिल की दुनियां में कोई नेक नहीं होता

जब तलक दिल में अतिरेक नहीं होता है
तब तलक एक भी मिस्टेक नहीं होता है

वो जो वाकिफ तुम्हारी हरेक आदत से
जान आशिक वो कभी फेक नहीं होता है

दिल ये कहता है नैनीताल में आकर यारों
ऐसा दिलकश भी कोई लेक नहीं होता है

शाइरी नौकरी परीवार आशिकी दुनिया
मेरा  किरदार कभी एक नहीं होता है।

राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...