ग़ज़ल
जो भी कमा रहे हो वो ज़र किसके लिये है।
जब कोई नहीं है तो ये घर किसके लिये है।
ऐसा न हो कि आईने में देख के खुद को
हम सोचने लगे कि ये डर किस के लिये है
इस शब के बाद भी वही वीरान सा ही दिन ।
ए दिल तुझे उम्मीद ए सहर किसके लिये है।
वो छत पे आ गये तो राज खुल गया ये की
इस तरह बेकरार कमर किसके लिये है
हर सिम्त इक दीवार नयी उठ रही है अब
आख़िर ये पत्थरों का नगर किसके लिये है
मिल कर किसी से आज समझ आ गया हमको।
अपना भी ये जवान जिगर किसके लिये है
धोखा फरेब झूठ कज़ा और नफरतें ।
दिल में तुम्हारे इतना ज़हर किसके लिये है
आखिर में जब हयात सिफ़र होना ही है तो
ता उम्र मुश्किलों का सफ़र किसके लिये है
राजीव कुमार
ज़र - दौलत पैसा धन
शब - रात
सहर - सुबह
क़मर- चाँद
सिफर - शुन्य
हयात- जीवन
जो भी कमा रहे हो वो ज़र किसके लिये है।
जब कोई नहीं है तो ये घर किसके लिये है।
ऐसा न हो कि आईने में देख के खुद को
हम सोचने लगे कि ये डर किस के लिये है
इस शब के बाद भी वही वीरान सा ही दिन ।
ए दिल तुझे उम्मीद ए सहर किसके लिये है।
वो छत पे आ गये तो राज खुल गया ये की
इस तरह बेकरार कमर किसके लिये है
हर सिम्त इक दीवार नयी उठ रही है अब
आख़िर ये पत्थरों का नगर किसके लिये है
मिल कर किसी से आज समझ आ गया हमको।
अपना भी ये जवान जिगर किसके लिये है
धोखा फरेब झूठ कज़ा और नफरतें ।
दिल में तुम्हारे इतना ज़हर किसके लिये है
आखिर में जब हयात सिफ़र होना ही है तो
ता उम्र मुश्किलों का सफ़र किसके लिये है
राजीव कुमार
ज़र - दौलत पैसा धन
शब - रात
सहर - सुबह
क़मर- चाँद
सिफर - शुन्य
हयात- जीवन
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