Friday, September 15, 2017

जिन्दगी क्या है इक जुआ पगली

फिलबदीह ग़ज़ल

जिन्दगी क्या है इक जुआ पगली
कौन इसमें है जीतता पगली

जिस्म से इश्क भूल जा पगली
रूह से रूह को मिला पगली

मर्ज अपना मुझे बता पगली
मैं हूं हर मर्ज की दवा पगली

क्या इरादा है ये बता पगली
देख यूं ही न मुस्कुरा पगली

रात भर खूब शोर करता है
तेरी यादों का काफिला पगली

मेरे मन की तो जानती है तू
अपने दिल की भी तो बता पगली

इश्क क्या है तुझे बताउंगा
पहले चलते हैं मयकदा पगली

हमकदम बन के गर चलेगी तो
कट ही जायेगा रास्ता पगली

दूर तक था धुंआं धुंआं लेकिन
एक बादल भी उसमें था पगली

खोटे सिक्कों के इस जमाने में
सिक्का अपना भी तू चला पगली

तेरी आंखें बता रहीं हैं सब।
लब से कुछ भी तू मत बता पगली

नाम से मत मुझे बुलाया कर
तू भी पागल मुझे बुला पगली

जिन्दगी चार दिन की मेहमां है
यूं ही तन्हा न तू बिता पगली

राजीव कुमार

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