रूह को जिस्म के सांचे में बिठा रक्खा है
और इन्सान को मिट्टी का बना रक्खा है
अपनी आंखों में जिसे हमने छुपा रक्खा है
हाय उसने ही हमे खुद से जुदा रक्खा है
जेब खाली हैं मगर दोनो जहां है जिसमें
हमने सीने में उसी दिल को छुपा रक्खा है
आप इक बार तो मांगो न मेरी जां हस के
जान दे देगे कि इस जान में क्या रक्खा है
चाहने वाले बहुत लोग मिरे हैं लेकिन
खुद को तेरे लिये दुनियां से बचा रक्खा है।
राजीव कुमार
और इन्सान को मिट्टी का बना रक्खा है
अपनी आंखों में जिसे हमने छुपा रक्खा है
हाय उसने ही हमे खुद से जुदा रक्खा है
जेब खाली हैं मगर दोनो जहां है जिसमें
हमने सीने में उसी दिल को छुपा रक्खा है
आप इक बार तो मांगो न मेरी जां हस के
जान दे देगे कि इस जान में क्या रक्खा है
चाहने वाले बहुत लोग मिरे हैं लेकिन
खुद को तेरे लिये दुनियां से बचा रक्खा है।
राजीव कुमार
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