ग़ज़ल
यहाँ तुम और हम उलझे हुए हैं।
कि जैसे दो क़दम उलझे हुए हैं।
मेरे दिल की हज़ारों धड़कनों में।
ज़माने भर के ग़म उलझे हुए हैं।
निकलना चाहते हैं खुद से बाहर ।
मगर हम दम ब दम उलझे हुए हैं।
तरक़्क़ी की नुमाइश हो रही है।
मगर दैरो-हरम उलझे हुए हैं।
ये जज़्बा ए मुहब्बत है कि हमसे।
सितमगर और सितम उलझे हुए हैं।
हयातो हश्र की दुनिया में यारों।
बहुत से पेंचो खम उलझे हुए हैं।
उधर एहसास घुटकर चीखते हैं।
इधर लफ़्ज़ों में हम उलझे हुए हैं।
राजीव कुमार
यहाँ तुम और हम उलझे हुए हैं।
कि जैसे दो क़दम उलझे हुए हैं।
मेरे दिल की हज़ारों धड़कनों में।
ज़माने भर के ग़म उलझे हुए हैं।
निकलना चाहते हैं खुद से बाहर ।
मगर हम दम ब दम उलझे हुए हैं।
तरक़्क़ी की नुमाइश हो रही है।
मगर दैरो-हरम उलझे हुए हैं।
ये जज़्बा ए मुहब्बत है कि हमसे।
सितमगर और सितम उलझे हुए हैं।
हयातो हश्र की दुनिया में यारों।
बहुत से पेंचो खम उलझे हुए हैं।
उधर एहसास घुटकर चीखते हैं।
इधर लफ़्ज़ों में हम उलझे हुए हैं।
राजीव कुमार
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