ग़ज़ल
झूठ जब से आप का सन्नाम है
सच हमारा तब से ही बेकाम है
दौरे हाजिर में किसी की दोस्ती
यूं समझिये आप से कुछ काम है
इक सदी इक साल कहते हो जिसे
कुछ नहीं वो सिर्फ सुब्हो शाम है
हां वही मैं आदमी हूं दोस्तो
आप की खातिर जो बिल्कुल आम है
अक्ल दो कौड़ी की होके रह गयी
चापलूसी का ही अच्छा दाम है
मीडीया में आज कल का मसअला।
या तो हिन्दू है या फिर इस्लाम है
खूं जला के क्या कमाया बोलिये
आखिरी पैसा है या फिर नाम है ?
राजीव कुमार
झूठ जब से आप का सन्नाम है
सच हमारा तब से ही बेकाम है
दौरे हाजिर में किसी की दोस्ती
यूं समझिये आप से कुछ काम है
इक सदी इक साल कहते हो जिसे
कुछ नहीं वो सिर्फ सुब्हो शाम है
हां वही मैं आदमी हूं दोस्तो
आप की खातिर जो बिल्कुल आम है
अक्ल दो कौड़ी की होके रह गयी
चापलूसी का ही अच्छा दाम है
मीडीया में आज कल का मसअला।
या तो हिन्दू है या फिर इस्लाम है
खूं जला के क्या कमाया बोलिये
आखिरी पैसा है या फिर नाम है ?
राजीव कुमार
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