ग़ज़ल
जिसे मिट्टी कहा तुमने वो मेरी मां के जैसी है।
मैं इसके लब पे रहता हूं ये मेरे दिल में रहती है।
अभी तक गर्दीशों में थे सितारे मैं अकेला था।
मिली जब कामयाबी तब लगा वो भी अकेली है।
पढ़े लिक्खो की दुनियां के उसूलों को समझ लीजे।
नहीं ली आपने रिस्वत तो फिर क्या खाक डिग्री है।
उगाते हैं जो खेतों में वतन की जिन्दगी यारों ।
उन्ही लोगों ने ही इस दौर में क्यु खुदकुशी की है।
जिसे देखो वही मजबूर है बेबस है बेचारा ।
वो जिसके दम से सबकी मेज पर थाली है रोटी है।
सियासी लोग अच्छे दिन के दावे कर रहें हैं पर।
अभी तक मसअला रोटी कमाई जिन्दगी ही है।
राजीव कुमार
जिसे मिट्टी कहा तुमने वो मेरी मां के जैसी है।
मैं इसके लब पे रहता हूं ये मेरे दिल में रहती है।
अभी तक गर्दीशों में थे सितारे मैं अकेला था।
मिली जब कामयाबी तब लगा वो भी अकेली है।
पढ़े लिक्खो की दुनियां के उसूलों को समझ लीजे।
नहीं ली आपने रिस्वत तो फिर क्या खाक डिग्री है।
उगाते हैं जो खेतों में वतन की जिन्दगी यारों ।
उन्ही लोगों ने ही इस दौर में क्यु खुदकुशी की है।
जिसे देखो वही मजबूर है बेबस है बेचारा ।
वो जिसके दम से सबकी मेज पर थाली है रोटी है।
सियासी लोग अच्छे दिन के दावे कर रहें हैं पर।
अभी तक मसअला रोटी कमाई जिन्दगी ही है।
राजीव कुमार
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