फिलबदीह गजल
रोयेंगे कब तलक कि गर्दिश में हैं सितारे
इक हम ही तो नहीं है लाखों है बे सहारे
जिन्दा रहेंगे तब तक जिन्दादिली रहेगी
गर मर गये तो इक दिन बन जायेगे सितारे
दुनिया से दुश्मनी कुछ इस तरह निभाई
हम दिल तो खूब हारे दिल से मगर न हारे।
रस्मो रवायतों की जब बेड़ीयों को तोड़ा
तब जान पाये दुश्मन अपने ही हैं हमारे
कश्मीरीयत को गोली जम्हूरियत ने मारी
इन्सानियत की बातें करते है झूठे सारे
मिल बैठ कर करेंगे गर बात मसअले पर
झगड़े फसाद सारे हो जायेंगे किनारे।
अच्छा चलो चलें अब ख्वाबों की सैर करने
चांद आ गया हैं छत पर संग लेके अपने तारे
राजीव कुमार
रोयेंगे कब तलक कि गर्दिश में हैं सितारे
इक हम ही तो नहीं है लाखों है बे सहारे
जिन्दा रहेंगे तब तक जिन्दादिली रहेगी
गर मर गये तो इक दिन बन जायेगे सितारे
दुनिया से दुश्मनी कुछ इस तरह निभाई
हम दिल तो खूब हारे दिल से मगर न हारे।
रस्मो रवायतों की जब बेड़ीयों को तोड़ा
तब जान पाये दुश्मन अपने ही हैं हमारे
कश्मीरीयत को गोली जम्हूरियत ने मारी
इन्सानियत की बातें करते है झूठे सारे
मिल बैठ कर करेंगे गर बात मसअले पर
झगड़े फसाद सारे हो जायेंगे किनारे।
अच्छा चलो चलें अब ख्वाबों की सैर करने
चांद आ गया हैं छत पर संग लेके अपने तारे
राजीव कुमार
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