गजल _1
आपकी निगाहों को शोखियां समझती हैं
हम नशे में हैं सारी मस्तीयां समझतीं है।
हर सितम हवाओं के नाज गुल फजाओं के
आप के ही जैसे ये तितलियां समझतीं हैं
आप की जुदाई में अब मिरा अकेलापन
गर्मीयां नहीं लेकिन सर्दियां समझतीं हैं
फिर बहार जायेगी फिर खिजां भी आयेगी।
दर्द इन दरख्तों का टहनियां समझतीं हैं
चोट खुद पे करना है चोट खुद ही खाना है
मुश्किलें इबादत की घंटियां समझतीं हैं
राजीव कुमार
आपकी निगाहों को शोखियां समझती हैं
हम नशे में हैं सारी मस्तीयां समझतीं है।
हर सितम हवाओं के नाज गुल फजाओं के
आप के ही जैसे ये तितलियां समझतीं हैं
आप की जुदाई में अब मिरा अकेलापन
गर्मीयां नहीं लेकिन सर्दियां समझतीं हैं
फिर बहार जायेगी फिर खिजां भी आयेगी।
दर्द इन दरख्तों का टहनियां समझतीं हैं
चोट खुद पे करना है चोट खुद ही खाना है
मुश्किलें इबादत की घंटियां समझतीं हैं
राजीव कुमार
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