Sunday, August 27, 2017

आपकी निगाहों को शोखियां समझती हैं

गजल _1

आपकी निगाहों को शोखियां समझती हैं
हम नशे में हैं सारी मस्तीयां समझतीं है।

हर सितम हवाओं के नाज गुल फजाओं के
आप के ही जैसे ये तितलियां समझतीं हैं

आप की जुदाई में अब मिरा अकेलापन  
गर्मीयां नहीं लेकिन सर्दियां समझतीं हैं

फिर बहार जायेगी फिर खिजां भी आयेगी।
दर्द इन दरख्तों का टहनियां समझतीं हैं

चोट खुद पे करना है चोट खुद ही खाना है
मुश्किलें  इबादत की घंटियां समझतीं हैं

राजीव कुमार

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