ग़ज़ल
रोजगारी भी मियां अब दर्दे सर होने को है
मेरा मतलब जिस्त अपनी दर ब दर होने को है
अपनी मायूसी छुपाने अब कहां जायेगे हम
ये मकाने दिल तो अपना खण्डहर होने को है
बर्फ यादों की तेरी पिघला गयीं तन्हाईयां
अब शुरू आंखो से दरिया का सफर होने को है
आप ने हमको कहा हम भूल जायें आप को
ऐसा लगता है ये किस्सा मुक्तसर होने को है
रास्ते हैं ठोकरें है और हैं कुछ मंजिले
राम जाने कौन अपना हमसफर होने को है ।
कब तलक सोये रहोगे अब तो उठ जाओ मियां
देख लो अब तो सुबह भी दोपहर होने को है
राजीव कुमार
रोजगारी भी मियां अब दर्दे सर होने को है
मेरा मतलब जिस्त अपनी दर ब दर होने को है
अपनी मायूसी छुपाने अब कहां जायेगे हम
ये मकाने दिल तो अपना खण्डहर होने को है
बर्फ यादों की तेरी पिघला गयीं तन्हाईयां
अब शुरू आंखो से दरिया का सफर होने को है
आप ने हमको कहा हम भूल जायें आप को
ऐसा लगता है ये किस्सा मुक्तसर होने को है
रास्ते हैं ठोकरें है और हैं कुछ मंजिले
राम जाने कौन अपना हमसफर होने को है ।
कब तलक सोये रहोगे अब तो उठ जाओ मियां
देख लो अब तो सुबह भी दोपहर होने को है
राजीव कुमार
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