Friday, October 18, 2019

बोल नहीं पाते तो इक दिन सचमुच में मर जाते हम

ग़ज़ल

बोल नहीं पाते तो इक दिन सचमुच में मर जाते हम
दर्द किसी का अपने दिल में कितने दिन रख पाते हम

ग़ज़लें नज़्में रिश्ते-नाते दुनियादारी जॉब अना
एक तुम्हारी ख़ातिर आख़िर किस किस को ठुकराते हम

खाली घर दो चार क़िताबें और हमारी तन्हाई
इस हालत में ख़ुद को सोचो किस हद तक बहलाते हम

सूरज चाँद सितारे बादल धरती दरिया और गगन
इतना सबकुछ खोकर कैसे शह्र तेरे रह पाते हम

ख्वाबों की वीरान सड़क पर उसको देख के लगता है
सुबह-सवेरे काश किसी दिन साथ उसे ले आते हम

जंगल की ये आग हमारे घर तक भी आ सकती है
कोई समझने वाला होता तो उसको समझते हम

बाग़-बगीचे फूल-परिंदे पेड़-नदी तालाब-कुआँ
आने वाली नस्लों को भी काश ये सब दे जाते हम

राजीव कुमार

हरबार जिसको हमसे ही जुर्माना चाहिये।

ग़ज़ल

हरबार जिसको हमसे ही जुर्माना चाहिये।
हमको भी उस निजाम को ठुकराना चाहिये।

जंगल नदी पहाड़ वतन सब हैं अब तबाह।
अब तो हुज़ूर आप को पछताना चाहिये।

चल ही नहीं रही है हुकूमत जो तुम से तो।
कुर्सी से तुमको यार  उतर जाना चाहिए।

खाली है पेट जेब भी खाली है आजकल।
तुमको तो इस विकास पे इतराना चाहिए।

वहशत की ज़द में आ गया है गर ये जहां तो
हमको  हमारे   वक्त   पे   शर्माना  चाहिये।

सच बोलना है बोलिए पर याद ये रहे।
सच बोल के इस दौर में घबराना चाहिए।

बन जाये गरचे क़ैद हमारा ही जिस्म तो।
भीतर से हमको खुद के निकल जाना चाहिये।

राजीव कुमार

ख़ूबसूरत कमाल देखेंगे।

ग़ज़ल

ख़ूबसूरत  कमाल  देखेंगे।
आईये   नैनीताल   देखेंगे।

हूबहू आप सा नहीं फिर भी।
आप  जैसा जमाल देखेंगे।

प्यार हमसे है कि नहीं बोलो।
फिर तुम्हारा सवाल देखेंगे।

एक अरसे से हिज्र देखा है।
आज से हम विसाल देखेंगे।

हमको भूली तो तेरे चेहरे पर।
लोग गर्द-ए-मलाल देखेंगे।

सब्र जो देखते हैं मेरा वो।
एक दिन इश्तिआल देखेंगे

वक्त रहते अगर न संभले तो।
ये  जमीं  पाएमाल देखेंगे।

राजीव कुमार

जमाल- सुन्दरता
हिज्र- बिछोह
विसाल- मिलन
गर्द-ए-मलाल - पछतावे के बादल
इश्तिआल- मार काट पर आमादा , उत्तेजना 
पाएमाल - बर्बाद

जमीं की प्यास और बारिस का पानी याद है हमको

जमीं की प्यास और बारिस का पानी याद है हमको
तुम्हारी और हमारी हर कहानी याद है हमको

जमाने बाद उसको देख के ऐसा लगा अब भी
दिवाना याद है उसको दिवानी याद है हमको

राजीव कुमार

ये ग़म नहीं कि किसी बेबसी की क़ैद में हूँ

ग़ज़ल

ये ग़म नहीं कि किसी बेबसी की क़ैद में हूँ
सितम ये है कि अभी ज़िन्दगी की क़ैद में हूँ

अमीरे ए शह्र तेरी रौशनी की क़ैद में हूँ
ये लग रहा है किसी बेहतरी कि क़ैद में हूं

मेरी रिहाई  की कोशिश न कीजिये  साहब।
हूजूर ए आला मैं तो आप ही की क़ैद में हूँ

न अश्क बह रहे हैं और न ही उदासी है
मुझे पता ही नहीं किस ख़ुशी की क़ैद में हूँ।

कोई कहे न कहे पर ये कह रहा हूं मैं।
निजामे हिन्द तेरी रहबरी की क़ैद में हूँ

मुझे तलाशने वालों जमीं पे मत ढूंढो
मैं अपने ज़हन की आवारगी की क़ैद में हूँ।

वो एक शेर जो तेरे लिये कहा तब से
तिरे ख्याल तेरी आशिकी की क़ैद में हूँ।

निकल के घर से मैं ओफिस में आ गया यानी
किसी की  क़ैद से छूटा किसी की क़ैद में हूँ

राजीव कुमार

किसी से हद से ज़्यादा आशिकी अच्छी नहीं रहती बहुत नज़दीकियों में भी वो दिलचस्पी नहीं रहती

ग़ज़ल

किसी से हद से ज़्यादा आशिकी अच्छी नहीं रहती
बहुत नज़दीकियों में भी वो दिलचस्पी नहीं रहती

हवा बारिस उजाले हम नहीं महसूस कर पाते
अगर घर में हमारे एक भी खिङकी नहीं रहती

यकीनन अपना घर भी फूंक देते ये सियासतदां
जलाने के लिये गर शह्र में बस्ती नहीं रहती

ख़ुदा कहने लगे है खुद को जो इस मुल्क के उनको
कोई बतलाये ज़्यादा दिन भी ये कुर्सी नहीं  रहती

निभा लेते हैं कैसे दुश्मनी कुछ लोग सारी उम्र
हमारे दिल में तो नाराज़गी तक भी नहीं रहती

बदन अपना तो रहता है मगर इस दुनिया फ़ानी में
जिसे हम रूह कहते हैं वही अपनी  नहीं रहती

राजीव कुमार

कुछ पता ही नहीं किधर हैं सब

ग़ज़ल

कुछ पता ही नहीं किधर हैं सब
इश्क में इतने बेखबर हैं सब

सारी दुनिया खिलाफ है लेकिन
तेरे आशिक तो तेरे दर हैं सब

जिन्दगी  आशिकी अकेला पन
आज कल ये भी ताक पर हैं सब

छोड़ कर हमको बढ़ गये आगे
जिनको सोचा था हमसफर हैं सब।

प्यार को लव जिहाद कहते हैं।
वो जो कहते हैं जानवर हैं सब

राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...