जो है हमारा लेंगे हम,
दमन नहीं सहेंगे हम
मुकद्दरोँ से रहमतों को,अब नहीं है मांगना,
असल हुकूक क्या है अब,वही है हमको जानना/
हमे हुकूक चाहिए,
हमे हुकूक चाहिए
वो कौन हैं जो नफरतों के बीज हम में बो गए,
हुकूमतों में बैठ कर तिज़ारतों में खो गए,
उन्ही की बेरुखी से हम हैं भूख के चपेट में,
भरोसे के निवाले ही हैं अब हमारे पेट में /
सवाल अब करेंगे हम,
जियेंगे या मरेंगे हम,
बिना जवाब के तो अब नहीं है हमको मानना ,
असल हुकूक क्या है, अब वही है हमको जानना/
हमे हुकूक चाहिए,
हुकूक चाहिए हमे /
वतन के इज्ज़तों पे है नजर गड़ाए भेड़िया,
इन्ही के राज में पड़ी हैं बेटियों को बेड़ियां/
ये तन पे आज नारियों के चोट के निशान क्यों,
बदन बदन हुए हैं बस हवस के ही गुलाम क्यूँ ,
तू बेवा है बहु भी है ,
लड़ाई है लहू भी है/
हर एक जुल्म का है, अब हमे हिसाब मांगना /
असल हुकूक क्या है, बस वही है हमको जानना/
हमे हुकूक चाहिए,
हुकूक चाहिए हमे /
रहम की आस में रहा तो,घर तेरा जलेगा अब,
सिसकता ही रहेगा तो, तू ही यहाँ मरेगा अब,
खुशी नहीं मिलेगी मांग कर जहां में जान ले,
कोई न कुछ कहेगा न सुनेगा अब ये मान ले,
तू अपने डर को मार दे,
खुदी को खुद उबार दे
किसी के खौफ को भी अब हमे नहीं है मानना,
असल हुकूक क्या है, अब वही है हमको जानना/
हमे हुकूक चाहिए,
हुकूक चाहिए हमे /
मुकाम अपने नाम पर नहीं हुआ तो क्या हुआ,
किसी की रहबरी से आज तक भला कहाँ हुआ/
फसल भी अम्न की कही अभी तलक उगी नहीं,
बिना लड़े किसी को जिंदगी कभी मिली नहीं/
उठेंगे न झुकेंगे हम,
कि अब नहीं रुकेंगे हम ,
सीतम के सरहदों के हद, को भी है हमको नापना.
असल हुकूक क्या है, अब वही है हमको जानना/
हमे हुकूक चाहिए,
हुकूक चाहिए हमे /
नजर उठा के देख ले समय को और हालत को,
निहत्थों की कभी नहीं सुनी गयी है बात को/
कटार अपने म्यान से,तू क्यूँ नहीं है खींचता ,
बिना लहू बहे कोई नहीं है जंग जीतता
न और इंतज़ार कर
की उठ के तू प्रहार कर,
तू कर ऐलान-ए-जंग, मिल के हम करेंगे सामना/
असल हुकूक क्या है, अब वही है हमको जानना/
हमे हुकूक चाहिए,
हुकूक चाहिए हमे /
जो है हमारा लेंगे हम,
दमन नहीं सहेंगे हम
मुकद्दरोँ से रहमतों को,अब नहीं है मांगना,
असल हुकूक क्या है अब,वही है हमको जानना/
हमे हुकूक चाहिए,
हमे हुकूक चाहिए
राजीव कुमार
दमन नहीं सहेंगे हम
मुकद्दरोँ से रहमतों को,अब नहीं है मांगना,
असल हुकूक क्या है अब,वही है हमको जानना/
हमे हुकूक चाहिए,
हमे हुकूक चाहिए
हुकूमतों में बैठ कर तिज़ारतों में खो गए,
उन्ही की बेरुखी से हम हैं भूख के चपेट में,
भरोसे के निवाले ही हैं अब हमारे पेट में /
सवाल अब करेंगे हम,
जियेंगे या मरेंगे हम,
बिना जवाब के तो अब नहीं है हमको मानना ,
असल हुकूक क्या है, अब वही है हमको जानना/
हमे हुकूक चाहिए,
हुकूक चाहिए हमे /
वतन के इज्ज़तों पे है नजर गड़ाए भेड़िया,
इन्ही के राज में पड़ी हैं बेटियों को बेड़ियां/
ये तन पे आज नारियों के चोट के निशान क्यों,
बदन बदन हुए हैं बस हवस के ही गुलाम क्यूँ ,
तू बेवा है बहु भी है ,
लड़ाई है लहू भी है/
हर एक जुल्म का है, अब हमे हिसाब मांगना /
असल हुकूक क्या है, बस वही है हमको जानना/
हमे हुकूक चाहिए,
हुकूक चाहिए हमे /
रहम की आस में रहा तो,घर तेरा जलेगा अब,
सिसकता ही रहेगा तो, तू ही यहाँ मरेगा अब,
खुशी नहीं मिलेगी मांग कर जहां में जान ले,
कोई न कुछ कहेगा न सुनेगा अब ये मान ले,
तू अपने डर को मार दे,
खुदी को खुद उबार दे
किसी के खौफ को भी अब हमे नहीं है मानना,
असल हुकूक क्या है, अब वही है हमको जानना/
हमे हुकूक चाहिए,
हुकूक चाहिए हमे /
मुकाम अपने नाम पर नहीं हुआ तो क्या हुआ,
किसी की रहबरी से आज तक भला कहाँ हुआ/
फसल भी अम्न की कही अभी तलक उगी नहीं,
बिना लड़े किसी को जिंदगी कभी मिली नहीं/
उठेंगे न झुकेंगे हम,
कि अब नहीं रुकेंगे हम ,
सीतम के सरहदों के हद, को भी है हमको नापना.
असल हुकूक क्या है, अब वही है हमको जानना/
हमे हुकूक चाहिए,
हुकूक चाहिए हमे /
नजर उठा के देख ले समय को और हालत को,
निहत्थों की कभी नहीं सुनी गयी है बात को/
कटार अपने म्यान से,तू क्यूँ नहीं है खींचता ,
बिना लहू बहे कोई नहीं है जंग जीतता
न और इंतज़ार कर
की उठ के तू प्रहार कर,
तू कर ऐलान-ए-जंग, मिल के हम करेंगे सामना/
असल हुकूक क्या है, अब वही है हमको जानना/
हमे हुकूक चाहिए,
हुकूक चाहिए हमे /
जो है हमारा लेंगे हम,
दमन नहीं सहेंगे हम
मुकद्दरोँ से रहमतों को,अब नहीं है मांगना,
असल हुकूक क्या है अब,वही है हमको जानना/
हमे हुकूक चाहिए,
हमे हुकूक चाहिए
राजीव कुमार
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