मतला
तेरी आंखों ने जब सियासत की
जान हमने भी तब हिमाकत की
आप से इक दफा मुहब्बत की
उम्र भर हमने फिर इबादत की
मैने ख्वाबों के इक तलातुम से
अपनी आंखों की भी हिफाजत की
दुश्मनी हो गयी जमाने से
हमने जो आप से मुहब्बत की
चांदनी आज फिर नहीं आई
किसने फिर आज भी शरारत की
राजीव कुमार
शुभ रात्री
तेरी आंखों ने जब सियासत की
जान हमने भी तब हिमाकत की
आप से इक दफा मुहब्बत की
उम्र भर हमने फिर इबादत की
मैने ख्वाबों के इक तलातुम से
अपनी आंखों की भी हिफाजत की
दुश्मनी हो गयी जमाने से
हमने जो आप से मुहब्बत की
चांदनी आज फिर नहीं आई
किसने फिर आज भी शरारत की
राजीव कुमार
शुभ रात्री
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