Friday, June 23, 2017

जमीने दिल की तपन में है कौन तुम हो क्या

ग़ज़ल 

जमीने दिल की तपन में है कौन तुम हो क्या
सूकून चैनो अमन में है कौन तुम हो क्या

ग़ज़ल का आज जमाना मूरीद है कितना ।
तमाम शेरो सुखन में है कौन तुम हो क्या।

न जाने कब से नहीं सोई हैं ये आंखें भी।
ख्याले हिज्रे चुभन में है कौन तुम हो क्या।

गुलों में रंग हवाओं में खुश्बुओं का घर ।
हरेक घर के चमन में है कौन तुम हो क्या।

बदन पे रौशनी लेकर निकलते है घर से
ये जुगनुओं की थकन में है कौन तुम हो क्या

मिरे लबों से हमेशा ही सच निकलता है
मिरी जुबां के वतन में है कौन तुम हो क्या

खुदा से जब भी मिलुंगा तो मै ये पूछूंगा
जमीं पे और गगन में है कौन तुम हो क्या।

राजीव कुमार

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