Saturday, October 7, 2017

किसी भी तौर से बेकारियां नहीं चलतीं

तरही ग़ज़ल
बह्र - 1212/1122/1212/22

किसी भी तौर से बेकारियां नहीं चलतीं
ग़मों की भीड़ में लाचारियां नहीं चलतीं।

बहुत से लोग मुहब्बत में भूल जाते हैं
वफ़ा की राह में मक्कारियां नहीं चलतीं ।

हमारे दिल में ज़माने का दर्द है साहिब।
हमारे सामने ग़मख़्वारियां नहीं चलतीं

अना को जीत के खुद को है हारना इसमें
दिलों के खेल में खुद्दारियां नहीं चलतीं

ज़मीं पे चलते अगर हुक्मरान अपने तो
ज़मीने-मुल्क पे दुश्वारियां नही चलतीं

दुआ सलाम सलीक़ा सुख़न में हैं जायज़
अदब के नाम पे अय्यारियां नहीं चलतीं।

राजीव कुमार
Rajeev Kumar
raj28094gmail.com

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