ग़ज़ल
खानाबदोश दिल का ठिकाना इधर उधर।
अच्छा है यार दिल का लगाना इधर उधर
तुम झूठ बोलने का मजा उनसे पूछना
आता है जिनको बात घुमाना इधर उधर ।
पहले ही जल रहे हैं शह़र के शह़र यहां ।
अब छोड़िये भी आग लगाना इधर उधर
ए जान आप अपनी नजर पर नजर रखो
अच्छा नहीं नजर का मिलाना इधर उधर
अपने ख़याल अपनी ज़बां अपनी फ़िक्र का
मैं भी लुटा रहा हूँ ख़ज़ाना इधर उधर
महफिल है शायरों की जरा दिल से बैठना।
आ कर नहीं है आपको जाना इधर उधर
ये चार दिन की जिन्दगी भी जिन्दगी है क्या ।
देखो भटक रहा है जमाना इधर उधर
अपने बदन का बोझ उठाना है इस लिये ।
हमको भी पड़ रहा है कमाना इधर उधर
राजीव कुमार
खानाबदोश दिल का ठिकाना इधर उधर।
अच्छा है यार दिल का लगाना इधर उधर
तुम झूठ बोलने का मजा उनसे पूछना
आता है जिनको बात घुमाना इधर उधर ।
पहले ही जल रहे हैं शह़र के शह़र यहां ।
अब छोड़िये भी आग लगाना इधर उधर
ए जान आप अपनी नजर पर नजर रखो
अच्छा नहीं नजर का मिलाना इधर उधर
अपने ख़याल अपनी ज़बां अपनी फ़िक्र का
मैं भी लुटा रहा हूँ ख़ज़ाना इधर उधर
महफिल है शायरों की जरा दिल से बैठना।
आ कर नहीं है आपको जाना इधर उधर
ये चार दिन की जिन्दगी भी जिन्दगी है क्या ।
देखो भटक रहा है जमाना इधर उधर
अपने बदन का बोझ उठाना है इस लिये ।
हमको भी पड़ रहा है कमाना इधर उधर
राजीव कुमार
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