जम्हूरीयत के नाम पे कुछ ऐसा हुआ है ।
बच्चा बड़ा बूड़ा हर एक सहमा हुआ है।
बन्दूक की गोली तो आ पहुंची है घर तलक।
सरहद की सियासत में मुल्क उलझा हुआ है।
पत्थर लिये सड़क पे आ गयी है अब अवाम।
अपना निजाम अब भी मगर सोया हुआ है।
अपने ही लोग अपनो की कब्रें रहे हैं खोद।
दुश्मन जो था वो चैन से अब बैठा हुआ है।
हर रोज अम्न के जहां उठते हैं जनाजे ।
उस सर जमीं पे किसका अलम फहरा हुआ है।
घर लौट के आते हैं तो मां पूछती है अब
बेटा तू तिरंगे से ही क्युं लिपटा हुआ है।
कश्मीर का जन्नत से जहन्नुम के सफर पर ।
क्या और कहुं पहले ही सब लिक्खा हुआ है।
राजीव कुमार
अलम -- झंण्डा
बच्चा बड़ा बूड़ा हर एक सहमा हुआ है।
बन्दूक की गोली तो आ पहुंची है घर तलक।
सरहद की सियासत में मुल्क उलझा हुआ है।
पत्थर लिये सड़क पे आ गयी है अब अवाम।
अपना निजाम अब भी मगर सोया हुआ है।
अपने ही लोग अपनो की कब्रें रहे हैं खोद।
दुश्मन जो था वो चैन से अब बैठा हुआ है।
हर रोज अम्न के जहां उठते हैं जनाजे ।
उस सर जमीं पे किसका अलम फहरा हुआ है।
घर लौट के आते हैं तो मां पूछती है अब
बेटा तू तिरंगे से ही क्युं लिपटा हुआ है।
कश्मीर का जन्नत से जहन्नुम के सफर पर ।
क्या और कहुं पहले ही सब लिक्खा हुआ है।
राजीव कुमार
अलम -- झंण्डा
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