Tuesday, December 31, 2019

जिसको जाना था जा चुका है अभी

ग़ज़ल

जिसको जाना था जा चुका है अभी
दर खुला किस लिये रखा है अभी

क्या हुआ ये भी सोचना है अभी
वो ही क्यु हमसे मुब्तिला है अभी

आग दिल मे लगा के अपने ही
दिल को जलता भी देखना है अभी

शह्र जाना है तो चले जाओ
पर वहां धुंध की हवा है अभी

कितने लोगों ने खुदकशी की है
और कितनों को ढूबना है अभी

किस तरह पैरहन से पहचानें 
मुल्क़ में कौन मर रहा है अभी

राजीव कुमार

Thursday, December 26, 2019

जहाँ-जहाँ भी हमें मयक़दा दिखाई दिया। हर एक शख़्स वहाँ एक-सा दिखाई दिया।

ग़ज़ल-

जहाँ-जहाँ भी हमें मयक़दा दिखाई दिया।
हर एक शख़्स वहाँ एक-सा दिखाई दिया।

नयी उम्मीद नया वलवला दिखाई दिया।
हमारी राह में जब मरहला दिखाई दिया।

जब आँख बंद हुई तब भी काम आया दिल
इसी से ख़्वाब इसी से ख़ुदा दिखाई दिया।

अदाएँ,  रंग,  हया,  हुस्न  ही  नहीं  उसमें।
अलग मिज़ाज, अलग ज़ाविया दिखाई दिया।

क़ुसूर  मेरा  नहीं  आइने   का है,  जिसमें।
मेरी ही शक़्ल का इक दूसरा दिखाई दिया।

यही तो फ़र्क है इस हुक्मरां में और हम में।
हमें  लहू  तो  उसे  ज़ायका  दिखाई दिया।

तुम्हारे   शह्र  तुम्हारे  निज़ाम  में  हमको।
हर एक ज़ुल्म, हर इक सानिहा दिखाई दिया।

करोड़ों  लोग  उसी  शह्र   के  पते  पर हैं।
जहाँ  हर एक  हमें लापता  दिखाई दिया।

तुम्हारे साथ मुझे आज का ये दिन सच में।
बहुत हसीन बहुत खुशनुमा दिखाई दिया।

राजीव कुमार

वलवला- जोश,उमंग
मरहला - मुश्किल difficulty
सानिहा  - दुर्घटना

ये वक़्त हो के तुझसे ज़ुदा काट रहे हैं।

ग़ज़ल

ये वक़्त हो के तुझसे ज़ुदा काट रहे हैं।
किस ज़ुर्म की हम यार सज़ा काट रहे हैं।

ग़म इसका नहीं बढ़ गयी है रात में सर्दी।
ग़म ये है कि हम तेरे बिना काट रहे हैं।

इक तेरे सिवा सब था कहानी में हमारी।
हम इसलिये क़िस्मत का लिखा काट रहे हैं।

सब चाहते हैं साफ हवा, ग्रीन नज़ारे।
फिर कौन हैं जो पेड़ हरा काट रहे हैं।

जब ख़त्म हुई धूप तो ये देख के तारे।
इस शब भी अंधेरे की रिदा काट रहे हैं।

ख़ामोश थे तो जान पे बन आयी हमारी।
इस वास्ते अब उनका कहा काट रहे हैं।

सर्दी में भवाली की खिली धूप का मंजर
हम लोग यहां दोस्त मजा काट रहे हैं।

राजीव कुमार

रिदा - चादर

झूठ जो बोलने का आदी है। हर तरफ उसकी ही मुनादी है।

ग़ज़ल

झूठ जो बोलने का आदी है।
हर तरफ उसकी ही मुनादी है।

आज के दौर की सियासत में।
जो कहे सच वही फसादी है।

अब दुवाओं की फिक्र है किसको।
मौत ने ज़िन्दगी बङा दी है।

कोट टाई भी ठीक है लेकिन
अब भी फैशन में यार खादी है

किससे रक्खें वफ़ा की उम्मीदें  ।
एक जुल्मी ही अपना हादी है

तुझसे  ज्यादा हसीं बहुत हैं पर
तू मेरे दिल की शाह जादी है

इश्क़ लिख दूं तो लोग कहते हैं।
अपना राजीव लव जिहादी है।

राजीव कुमार

Saturday, December 14, 2019

जाना कहाँ था और कहाँ जा रहे हैं हम

ग़ज़ल

जाना कहाँ था और कहाँ जा रहे हैं हम
वहशत की ज़द में देखिये फिर आ रहे है हम

अपनो से अपने घर में ही घबरा रहे हैं हम
इन्सानियत को देख के शरमा रहे हैं हम

ये जान कर भी कोई नहीं सुन रहा है पर
जम्हूरियत के दश्त में चिल्ला रहे हैं हम

हर एक सांस अपनी कज़ा करके रात दिन
इस  ज़िन्दगी को रोज़ रोज़ खा रहे हैं हम

हर फैसला खिलाफ़ है जिसका अवाम के
यारो अब उस निज़ाम को  ठुकरा रहे हैं हम

जिस अहद में दस्तूर झूठ बोलने का था
उस अहद में सच बोल के पछता रहे हैं हम

तू कह रहा है तो ये तेरा शह्र छोङ कर
जाने का मन नहीं है मगर जा रहे हैं हम

राजीव कुमार

सहराओं में बादल की रिदा ओढ़ के निकले।

ग़ज़ल

सहराओं में  बादल  की रिदा ओढ़  के निकले।
जब घर से  बुज़ुर्गों की  दुआ  ओढ़ के निकले।

हम  जानते  थे   मुश्किलें   आयेगी   सफर  में।
हम इस लिये हिम्मत की क़बा ओढ़ के निकले।

तू  आये  तो  एज़ाज  ये  हासिल हो चमन को।
जो  फूल  खिले   रंग  तेरा   ओढ़  के  निकले।

मर  कर  भी  जी  रहे  हैं वही  आज तक यहां।
जो  दिल में महब्बत की बक़ा ओढ़ के निकले।

चेहरे  पे एक  चेहरा  सभी  के  है  कहो तुम।
इस शह्र में हम कैसे वफा ओढ़ के निकले।

खतरा था भटकने का सो हम  अपने बदन पर ।
चादर की  जगह  अपना पता  ओढ़ के निकले।

राजीव कुमार

सहराओं - मरुस्थल
रिदा - चादर 
बक़ा - अमरत्व
क़बा- चोला वस्त्र

वीराने को वहशत ज़िन्दा रखती है।

ग़ज़ल

वीराने  को   वहशत  ज़िन्दा  रखती है।
यानी प्यार  को फ़ुर्क़त ज़िन्दा रखती है।

दीवानी  को  ताअत   ज़िन्दा  रखती है।
दीवाने  को   शिद्दत    ज़िन्दा  रखती है।

हर  पल एक  अजीयत ज़िन्दा रखती है।
जिन   लोगों  को गुर्बत ज़िन्दा रखती है।

घर आंगन  की सूरत  ज़िन्दा  रखती हैं।
उन  दीवारों  को छत  ज़िन्दा  रखती है।

यूं तो हर इक चीज़ की कीमत है लेकिन।
किरदारों  को   ग़ैरत   ज़िन्दा   रखती  है।

रिन्दों  की  ख़ातिर  हैं  ये  मयखाने  पर।
मुझको  इक   तेरी  लत ज़िन्दा रखती है।

वहशत  खा  जाती  है  लाखों  लोगो को।
मुल्क़ को  यारो वहदत  ज़िन्दा रखती है।

सच  बोले  तो  शाम  तलक  मर  जायेगे।
जिन लोगों  को  गीबत  ज़िन्दा  रखती है।

जीते  जी  कुछ  लोग  हैं मुर्दों की मांनिंद।
कुछ  लोगों  को  तुर्बत  ज़िन्दा  रखती  है।

सरहद  में   रह  कर   तो  ये  मर  जायेंगी।
कुछ चिङीयों को हिजरत ज़िन्दा रखती है।

शह्रों    की   सांसें   चलती   हैं   दौलत से।
गांवों  को   तो   इज्ज़त  ज़िन्दा  रखती है।

राजीव कुमार

फुर्कत- बिछङना / ताअत- समर्पण, श्रद्धा / अजीयत- तकलीफ़ दुःख / गुर्बत- ग़रीबी/ वहदत- एकता / गीबत - पीठ पीछे बुराई / तुर्बत- मकबरा / हिजरत- प्रवास

Monday, December 9, 2019

ग़ज़ल

अपने चेहरे पे नया चेहरा लगा भी न सकूँ।
आईना देख के मैं खुद को छुपा भी न सकूँ।

ये जो किस्सा  है महब्बत का मिरे सीने में
ये वो किस्मत का लिखा है जो मिटा भी न सकूँ।

चन्द टुकड़े है ये कागज के मगर जाने क्युँ
खत तेरे चाहूँ जला दूं तो जला भी न सकूँ।

जिस्म की हद से निकलने का यही था मकसद
तू बुलाये तो कभी लौट के आ भी न सकूँ

चोट खा कर ये मेरा दिल भी किसी बच्चे सा।
जब भी रोये मैं इसे हस के हसा भी न सकूँ।

ये जमाना है जमाने से गिला क्या करना।
खुद से लड़ के मैं अगर खुद को मिटा भी न सकूँ

राजीव कुमार

Saturday, December 7, 2019

शूरू होने लगी है दास्ताँ आहिस्ता आहिस्ता ।

ग़ज़ल

शूरू होने लगी है दास्ताँ आहिस्ता आहिस्ता ।
वो हम पर हो रहा है मेहरबाँ आहिस्ता आहिस्ता ।

युं ही मिलते रहे तो ख़त्म हो जायेगी हर दूरी ।
हमारे और तुम्हारे दर्मियाँ आहिस्ता आहिस्ता।

ज़रूरी है बहुत तालीम की बुनियाद बच्चों में ।
तभी तामीर होता है मकाँ आहिस्ता आहिस्ता।

तुम्हें हक़ चाहिये तो सर उठाना सीख लो वर्ना।
सितम ढाता रहेगा हुक्मराँ आहिस्ता आहिस्ता।

सङक पर इस तरह होने लगे इन्साफ तो इक दिन
वतन हो जायेगा फिर रायगाँ आहिस्ता आहिस्ता।

निकलकर दोस्तों नाकामियों की ज़द से हमको भी।
ज़मीं पर खींचना है आसमाँ आहिस्ता आहिस्ता।

ये दुनिया दौलतें उल्फ़त वफ़ा ईमान हर इक ग़म
हमारे साथ होंगे रफ़्तगाँ आहिस्ता आहिस्ता

राजीव कुमार

रायगाँ- बर्बाद
रफ़्तगाँ- मृत

Thursday, December 5, 2019

हवा में ख़ुशबुएँ लाये फ़जा के लहजे में

ग़ज़ल

हवा में  ख़ुशबुएँ लाये फ़जा के लहजे में
क़ोई तो फूल खिलाये दुआ के लहजे में

लबों पे आज वही है सदा के लहजे में ।
वो दर्द जो था किसी इंतेहा के लहजे में ।

नमीं लबों पे निगाहों में बिजलियां लेकर ।
बरस रही थी वो मुझ पर घटा के लहजे में

फरेब खा के भी उस पर यकीन है सबको
यही कमाल है उस बेवफा के लहजे में।

उसी से हमको शिफा की है सारी उम्मीदें
जो दर्द देने लगा है दवा के लहजे में।

शज़र पे होने लगा ज़ुल्म तो ये जंगल के
परिंदे चीख उठे इल्तिजा के लहजे में।

वो हमको छोङ गया तब यकीन ये आया
अब और कोई नहीं है ख़ुदा के लहजे में।

राजीव कुमार

Saturday, November 30, 2019

मैं कह रहा हूं मेरी मानो यार मत करना

ग़ज़ल

मैं कह रहा हूं मेरी मानो यार मत करना
उफनते दर्या को रुक जाओ पार मत करना।

हो जब तलक न मियां ख़ुद की हैसियत तब तक
किसी अमीर हसीना से प्यार मत करना

दवा तो क्या है दुवायें भी कुछ असर न करें
सवार सर पे तुम ऐसा बुखार मत करना

न पा सको जो किसी को तो इश्क़ मे ख़ुद को
कभी सुपुर्द ए रसन और दार मत करना

किसी से मिलना तो कुछ दिन उसे परखना भी।
किसी पे यूं ही कभी एतबार मत करना

जिसे निभाने की उम्मीद ही न हो कोई 
किसी से कोई भी ऐसा करार मत करना

ये और बात है जख़्मी हैं पर ए अग्यारो
हमारी मौत का तुम इन्तज़ार मत करना

लङाये हिन्दु मुसलमान को जो पढ़ लिख कर
तुम अपने आप को ऐसा गंवार मत करना

है बेख़बर जो हमारी हर एक मुश्किल से
अब उस निज़ाम पे फिर एतबार मत करना

राजीव कुमार

Thursday, November 28, 2019

नींद का ख़्वाब से इस बार ये सौदा कर लूं तुमको देखुंगा मगर पहले अंधेरा कर लूं

ग़ज़ल

नींद  का ख़्वाब से इस बार ये सौदा कर लूं
तुमको देखुंगा मगर पहले अंधेरा कर लूं

इस तरह तुझपे मेरी जान मैं कब्ज़ा कर लूं
चाहता हूं तेरे हर ग़म को मैं अपना कर लूं

एक मुद्दत से अधूरा हूं इसी ख़्वाहिश में
तुम जो मिल जाओ तो ख़ुद को भी मैं पूरा कर लूं

अब तेरे शह्र में कोई भी नहीं है तुझ सा।
जिसके ईमान पे मैं यूं ही भरोसा कर लूं।

तू हवाओं की तरफ है तो क्या इस इक डर से।
मैं अंधेरों में चरागों से किनारा कर लूं

उसको अब मेरी ज़रूरत ही नहीं तो मैं भी।
उससे अब ख़त्म महब्बत का ये क़िस्सा कर लूं

हद से गुजरा ये ग़मे हिज़्र तो दिल में आया
हिज्र का लुत्फ़ किसी बार में अब जाकर लूं

राजीव कुमार

इस तरह इश्क़ सर पे तारी है ज़िन्दगी ज़िन्दगी पे भारी है

ग़ज़ल

इस तरह इश्क़ सर पे तारी है
ज़िन्दगी ज़िन्दगी पे भारी है

ज़िन्दगी इक दरख्त है उस पर
वक़्त जैसे कि क़ोई  आरी है

ज़िस्म अपना तो है मगर जां पर
सारी दुनिया की दावेदारी है

झूठ हम बोलते नहीं लेकिन
सच बताने में रिस्क भारी है

हम समझते थे फूल है जिसको
उसकी कांटों से रिश्तेदारी है

हमसे वो ही सवाल करते हैं
जिनकी हम से जवाबदारी है

वो हमारी है जान और वो ही
दुश्मन ए जान भी हमारी है

राजीव कुमार

Monday, November 25, 2019

घर-बार काम-धाम दोस्त-यार भी नहीं।

ग़ज़ल

घर-बार काम-धाम दोस्त-यार भी नहीं।
यानी कोई हमारा तरफदार भी नहीं।

जो तुम समझ रहे हो वो किरदार भी नहीं।
आसां नहीं हूं और मैं दुश्वार भी नहीं।

इक शख़्स ख़ुद से लड़ते हुए हो गया हलाक।
ये जीत गर नहीं तो कोई हार भी नहीं।

सरकार से सवाल करे ऐसा एक भी।
इस दौर में अब दोस्तों अख़बार भी नहीं।

क्या होगी इससे ज्यादा जहालत की और हद।
लोगों के हक में उनका ही सरदार भी नहीं।

हैरान हूँ मैं उनके इस अंदाज़ से कि वो
लड़ते हैं और हाथ में हथियार भी नहीं।

हर रोज़ मंज़िलें नई पाते हैं किस तरह
इस दर्ज़ा तेज आप की रफ़्तार भी नहीं।

सच बोल कर अकेले भला क्या करूंगा मैं।
सच जानने को अब कोई तैयार भी नहीं।

राजीव कुमार

झूठ या सच लिखे कलम पर है

ग़ज़ल

झूठ या सच लिखे कलम पर है
फिर भी दारोमदार हम पर है

मौत पर अपना बस नहीं है और
ज़िन्दगी जाने किसके दम पर है

बोलो इल्ज़ाम मौत का मेरे
दैर पर है या के हरम पर है

मुझको आज़ाद मुझसे कर देगा
कितनी उम्मीद बे रहम पर है

भूख वहशत लङाई बेकारी।
अब जहालत भी तो चरम पर है

मुल्क़ मज़हब ज़मीन का झगड़ा
सिर्फ़ और सिर्फ़ इक अहम पर है

आप जो चाहते हैं पा जायें
ये भी तो आप के करम पर है

सर्दी ए नैनीताल में यारों ।
इक भरोसा है वो भी रम पर है।

राजीव कुमार

दिल से निकले हुए लफ़्ज़ों को दुआ कहते हैं

*ग़ज़ल*

दिल  से निकले हुए लफ़्ज़ों को दुआ कहते हैं
लब पे आ जाये तो उस शय को सदा कहते हैं

इश्क़  वालों  का अलग  अपना ज़हां है इसमें।
दर्द   को   दर्द   नहीं   कहते   दवा   कहते  हैं।

आपको   देखना   फिर   देखते   रहना  यूं ही।
हम  इसे  इश्क  मगर   लोग  नशा  कहते  हैं।

फूल कहते  हैं  कभी  ख्वाब कभी अपनी जां।
आप  मत पूछिये  हम आप को क्या कहते हैं।

क्या  पता  आपने   कैसा  किया जादू की हम 
आप  को  देख   के  हर   शेर  नया  कहते हैं।

उम्र भर चाहना  उसको जो नहीं मिल सकता।
इस रवायत  को ही  उल्फ़त में सज़ा कहते हैं।

आप  का  हुस्न  है या वादिये कश्मीर की अब।
आप  को  लोग  भी  जन्नत  का ख़ुदा कहते है।

वो जो दुनिया के लिये कुछ भी नहीं कर पाये।
वो  ही हर  बात पे  दुनिया  को बुरा  कहते हैं।

हम  भी हैरान  हैं इस  बात  से हम  जाने  क्युं।
जिसको  देखा  ही  नहीं  उसको ख़ुदा कहते हैं।

राजीव कुमार

प्यार का परचम जबसे हमने थाम लिया

ग़ज़ल-

प्यार का परचम जबसे हमने थाम लिया
दुनिया भर का अपने सर इल्ज़ाम लिया

चोर-सिपाही,   गिल्ली-डण्डा,   पोशम्पा
बचपन में   यारों  से  कितना काम लिया

काटने  आया  था  जो  पेड़ों  को  उसने
छाँव में पहले बैठ के कुछ आराम लिया

बाँट के ऊपर   वाले  को इस  दुनिया ने
सिक्ख, ईसाई, हिन्दू और इस्लाम लिया

त्याग, तपस्या, प्यार, वफा, किरदार नहीं
राम से  हमने केवल  जय श्रीराम  लिया

दर्द,  मुसीबत,  दुश्वारी  सब  भूल  गये
बिटिया ने जब पापा कह के नाम लिया

- राजीव कुमार

आप जैसे ज़हीन से पहले

ग़ज़ल

आप   जैसे  ज़हीन  से  पहले
आदमी  था  मशीन   से पहले

हमको लङना है तीन से पहले
ज़ात मज़हब से दीन से पहले

आप  के  फ़ैसलों   ने  तोङे  है
दिल  हमारे  यक़ीन  से  पहले

सब क़बीले ख़ुशी से रहते थे
आपसे हमसे  दीन  से  पहले

हमको  दो  गज  ज़मीन देनी थी
पांच  एकड़  ज़मीन  से  पहले

कितना वीरान था हमारा दिल
आप जैसे   मकीन   से  पहले

कितने आये चले गये कितने
तेरे जैसे हसीन से पहले

राजीव कुमार

फोटो - भवाली में बाब नीम करौरी
का कैची धाम जिनके भक्त एप्पल कम्पनी
के स्टीव जोबस थे और फेसबुक के
मार्कजुकरबर्ग भी हैं।

ग़ज़ल प्यार में जिससे धोखा खाया उससे ही फिर यारी की

ग़ज़ल

प्यार में जिससे धोखा खाया उससे ही फिर यारी की
तब जा कर ही समझ में आयीं बातें दुनियादारी की

दफ़्तर ओहदा फ़ाईल पब्लिक दोस्त पङोसी अपना घर
क्या बतलाऊं इस जीवन से कितनी मारा मारी की

उसे भूलाने की कोशिश में ख़ुद को ऐसे भूले हम
शब में दिन का बोझ उठाया दिन में शब-बेदारी की

जंगल फूल परिंदे पर्वत झील नदि आकाश हवा।
हमको ज़िन्दा रखने वालों से हमने गद्दारी की

शाम को तन्हा सिग्रेट पीते देख के मुझको कमरे में
खिड़की बिस्तर दरवाजों ने मुझसे बात तुम्हारी की।

बाबू सोना बेबी कह कर दिन भर पीछे घूमते हो
प्यार महब्बत ठीक है लेकिन लाज रखो खुद्दारी की

फोन उठाऊँ काल लगाऊं फिर सोचा कल देखेंगे।
बिछङ के उसकी याद आई तब हमने ये हुश्यारी की

सीख बुजुर्गों की ये अक़्सर काम हमारे आयी है
पहले अपना होश संभाला जंग की फिर तैय्यारी की

सच बोलो ये दौर तरक्की का है तो फिर इसमें क्युं
चीख रहे हैं पेड़ बेचारे सुनवाई है आरी की।

मंदिर मस्जिद के ये झगड़े खत्म नहीं होंगे तब तक
जब तक बस्ती वालों में है दहशत इक चिंगारी की।

राजीव कुमार

Friday, October 18, 2019

बोल नहीं पाते तो इक दिन सचमुच में मर जाते हम

ग़ज़ल

बोल नहीं पाते तो इक दिन सचमुच में मर जाते हम
दर्द किसी का अपने दिल में कितने दिन रख पाते हम

ग़ज़लें नज़्में रिश्ते-नाते दुनियादारी जॉब अना
एक तुम्हारी ख़ातिर आख़िर किस किस को ठुकराते हम

खाली घर दो चार क़िताबें और हमारी तन्हाई
इस हालत में ख़ुद को सोचो किस हद तक बहलाते हम

सूरज चाँद सितारे बादल धरती दरिया और गगन
इतना सबकुछ खोकर कैसे शह्र तेरे रह पाते हम

ख्वाबों की वीरान सड़क पर उसको देख के लगता है
सुबह-सवेरे काश किसी दिन साथ उसे ले आते हम

जंगल की ये आग हमारे घर तक भी आ सकती है
कोई समझने वाला होता तो उसको समझते हम

बाग़-बगीचे फूल-परिंदे पेड़-नदी तालाब-कुआँ
आने वाली नस्लों को भी काश ये सब दे जाते हम

राजीव कुमार

हरबार जिसको हमसे ही जुर्माना चाहिये।

ग़ज़ल

हरबार जिसको हमसे ही जुर्माना चाहिये।
हमको भी उस निजाम को ठुकराना चाहिये।

जंगल नदी पहाड़ वतन सब हैं अब तबाह।
अब तो हुज़ूर आप को पछताना चाहिये।

चल ही नहीं रही है हुकूमत जो तुम से तो।
कुर्सी से तुमको यार  उतर जाना चाहिए।

खाली है पेट जेब भी खाली है आजकल।
तुमको तो इस विकास पे इतराना चाहिए।

वहशत की ज़द में आ गया है गर ये जहां तो
हमको  हमारे   वक्त   पे   शर्माना  चाहिये।

सच बोलना है बोलिए पर याद ये रहे।
सच बोल के इस दौर में घबराना चाहिए।

बन जाये गरचे क़ैद हमारा ही जिस्म तो।
भीतर से हमको खुद के निकल जाना चाहिये।

राजीव कुमार

ख़ूबसूरत कमाल देखेंगे।

ग़ज़ल

ख़ूबसूरत  कमाल  देखेंगे।
आईये   नैनीताल   देखेंगे।

हूबहू आप सा नहीं फिर भी।
आप  जैसा जमाल देखेंगे।

प्यार हमसे है कि नहीं बोलो।
फिर तुम्हारा सवाल देखेंगे।

एक अरसे से हिज्र देखा है।
आज से हम विसाल देखेंगे।

हमको भूली तो तेरे चेहरे पर।
लोग गर्द-ए-मलाल देखेंगे।

सब्र जो देखते हैं मेरा वो।
एक दिन इश्तिआल देखेंगे

वक्त रहते अगर न संभले तो।
ये  जमीं  पाएमाल देखेंगे।

राजीव कुमार

जमाल- सुन्दरता
हिज्र- बिछोह
विसाल- मिलन
गर्द-ए-मलाल - पछतावे के बादल
इश्तिआल- मार काट पर आमादा , उत्तेजना 
पाएमाल - बर्बाद

जमीं की प्यास और बारिस का पानी याद है हमको

जमीं की प्यास और बारिस का पानी याद है हमको
तुम्हारी और हमारी हर कहानी याद है हमको

जमाने बाद उसको देख के ऐसा लगा अब भी
दिवाना याद है उसको दिवानी याद है हमको

राजीव कुमार

ये ग़म नहीं कि किसी बेबसी की क़ैद में हूँ

ग़ज़ल

ये ग़म नहीं कि किसी बेबसी की क़ैद में हूँ
सितम ये है कि अभी ज़िन्दगी की क़ैद में हूँ

अमीरे ए शह्र तेरी रौशनी की क़ैद में हूँ
ये लग रहा है किसी बेहतरी कि क़ैद में हूं

मेरी रिहाई  की कोशिश न कीजिये  साहब।
हूजूर ए आला मैं तो आप ही की क़ैद में हूँ

न अश्क बह रहे हैं और न ही उदासी है
मुझे पता ही नहीं किस ख़ुशी की क़ैद में हूँ।

कोई कहे न कहे पर ये कह रहा हूं मैं।
निजामे हिन्द तेरी रहबरी की क़ैद में हूँ

मुझे तलाशने वालों जमीं पे मत ढूंढो
मैं अपने ज़हन की आवारगी की क़ैद में हूँ।

वो एक शेर जो तेरे लिये कहा तब से
तिरे ख्याल तेरी आशिकी की क़ैद में हूँ।

निकल के घर से मैं ओफिस में आ गया यानी
किसी की  क़ैद से छूटा किसी की क़ैद में हूँ

राजीव कुमार

किसी से हद से ज़्यादा आशिकी अच्छी नहीं रहती बहुत नज़दीकियों में भी वो दिलचस्पी नहीं रहती

ग़ज़ल

किसी से हद से ज़्यादा आशिकी अच्छी नहीं रहती
बहुत नज़दीकियों में भी वो दिलचस्पी नहीं रहती

हवा बारिस उजाले हम नहीं महसूस कर पाते
अगर घर में हमारे एक भी खिङकी नहीं रहती

यकीनन अपना घर भी फूंक देते ये सियासतदां
जलाने के लिये गर शह्र में बस्ती नहीं रहती

ख़ुदा कहने लगे है खुद को जो इस मुल्क के उनको
कोई बतलाये ज़्यादा दिन भी ये कुर्सी नहीं  रहती

निभा लेते हैं कैसे दुश्मनी कुछ लोग सारी उम्र
हमारे दिल में तो नाराज़गी तक भी नहीं रहती

बदन अपना तो रहता है मगर इस दुनिया फ़ानी में
जिसे हम रूह कहते हैं वही अपनी  नहीं रहती

राजीव कुमार

कुछ पता ही नहीं किधर हैं सब

ग़ज़ल

कुछ पता ही नहीं किधर हैं सब
इश्क में इतने बेखबर हैं सब

सारी दुनिया खिलाफ है लेकिन
तेरे आशिक तो तेरे दर हैं सब

जिन्दगी  आशिकी अकेला पन
आज कल ये भी ताक पर हैं सब

छोड़ कर हमको बढ़ गये आगे
जिनको सोचा था हमसफर हैं सब।

प्यार को लव जिहाद कहते हैं।
वो जो कहते हैं जानवर हैं सब

राजीव कुमार

Sunday, August 18, 2019

हमें छोटा सा छ़प्पर चाहिये था हमें कब सारा अम्बर चाहिये था

हमें छोटा सा छ़प्पर चाहिये था
हमें कब सारा अम्बर चाहिये था

तुम्हे क्या सच में रहबर चाहिये था
तुम्हे तो सिर्फ सेंगर चाहिये था

वही उन्नाव पर चुप हैं अभी तक।
जिन्हें पहलू का अलवर चाहिये था।

तरक्की ले के बेटा क्या करोगे ।
तुम्हें तो सम्भू रैगर चाहिये था।

करें किससे शिक़ायत हुकमरां की।
हमें ही शाह ख़ुद सर चाहिये था।
ख़ुद- सर - अभिमानी arrogant

पुराने वक्त में पत्थर के बदले
ज़माने को जवाहर चाहिये था
जवाहर = नायाब पत्थर

जमीं जर-खेज अब वो मांगते हैं।
जिन्हें हर खेत बंजर चाहिये था।
ज़र ख़ेज - उपजाऊ

अरे क्युं सर उठा रक्खा है तुमने
तुम्हें होना ही बेसर चाहिये था

राजीव कुमार

सकूं मिला न कहीं हर घङी उदास रहा। कि तेरे बाद मैं जब तक अदब शनास रहा।

ग़ज़ल

सकूं मिला न कहीं हर घङी उदास रहा।
कि तेरे बाद मैं जब तक अदब शनास रहा।

मेरी गज़ल में तेरा इस तरह निवास रहा
मैं दूर हो के भी तेरे ही आस पास रहा

तुम्हारे आने से पहले न मौत आ जाये
तमाम उम्र यही दिल में इक हिरास रहा
(हिरास-डर)

वो मैं नहीं था कोई और था मेरे भीतर
जो मुझसे ज्यादा तेरे गम से बद हवास रहा

तबाह जिसने किया उसका ही नजाने क्युं
हमेशा मैं भी मेरे दोस्त पुर सिपास रहा
(पुर सिपास-आभारी Thankful)

तुम्हारे झूठ यहां  पैरहन बदलते रहे
हमारा सच तो हर इक रोज बे लिबास रहा।

राजीव कुमार

दिल को न बेकरार करो जाम उठाओ ऐसा न मेरे यार करो जाम उठाओ

ग़ज़ल

दिल को न बेकरार करो जाम उठाओ
ऐसा न मेरे यार करो जाम उठाओ

सर पे न ज़िद सवार करो जाम उठाओ
दिलबर न इन्तज़ार करो जाम उठाओ

धोखा फ़रेब रंज जफ़ा ज़िन्दगी के ग़म
हर एक दर-किनार करो जाम उठाओ

दैरो हरम ओ दीन धरम सबको भूला कर
साकी पे एतबार करो जाम उठाओ

अच्छा बुरा ही सोचते रहते हो हमेशा
ख़ुद से भी थोङा प्यार करो जाम उठाओ

तुमको नहीं सलीका महब्बत का सुनो तुम।
लहजे में कुछ सुधार करो जाम उठाओ

कोई न कोई ऐब यहां हर किसी में है।
ख़ुद को भी ऐबदार करो जाम उठाओ

गर ये खता है तो ये खता मेरे अजीजों
हर रोज बार बार करो जाम उठाओ

राजीव कुमार

फूल खिलता नहीं देखा है तो क्या देखा है

ग़ज़ल

फूल खिलता नहीं  देखा है तो क्या देखा है
उनका चेहरा नहीं देखा है तो क्या देखा है

ख्वाब देखे हैं बहुत तुमने मगर ख़्वाबों  में
उसको पाना नहीं देखा है तो क्या देखा है

तुमने देखें हैं बहुत चाहने वाले लेकिन
मुझसा लङका नहीं देखा है तो क्या देखा है

अपने भीतर के बियाबान में ख़ुद को तुमने
गर भटकता नहीं देखा है तो क्या देखा है

दौरे हाज़िर की हकूमत के नुमाइन्दों सा।
तुमने झूठा नहीं देखा है तो क्या देखा है

शह्र दर शह्र महब्बत की हसीं गलियों में
ख़ून बहता नहीं देखा है तो क्या देखा है

राजीव कुमार

दुश्वारी को पांव पकङते देखा है

ग़ज़ल

दुश्वारी को पांव पकङते देखा है
पल-पल अपना वक्त बिगङते देखा है 

खोना पाना आना जाना जान गया
जिसने पत्ता पेड़ से झड़ते देखा है

आज तुम्हारा वक्त है वर्ना हमने भी
बड़े बड़ों  को नाक रगड़ते देखा है

फुटपाथों पर बैठ के पढ़ने वालों को
यारों अपने आप से लड़ते देखा है।

मंजिल पाने की दुश्वारी क्या बोलूं
चींटी को दीवार पे चढ़ते देखा है?

वो शाइर जो शेर नहीं कह सकता था 
उसको हमने आप को पढ़ते देखा है

इश्क करें या जोब इसी इक मुद्दे पर 
अक्ल को दिल से अक्सर लङते देखा है।

राजीव कुमार

Wednesday, June 5, 2019

यानी वो फिर ग़ज़ल से नहाई हुई तो है।

ग़ज़ल

खुश्बू   तमाम   शह्र   में   लाई  हुई   तो है।
यानी  वो  फिर  ग़ज़ल  से नहाई  हुई तो है।

उम्मीद   ज़िन्दगी    की   जगाई   हुई तो है।
बोतल   में  कुछ   शराब  बचाई   हुई तो है।

मंजिल  नहीं  मिलेगी भला कब तलक हमें।
रफ़्तार   हमने   अपनी   बढ़ाई   हुई  तो है।

कुछ फायदा नहीं है छुपाने से दिल कि बात।
ये   बात   दिल   में  सबने  दबाई हुई तो है।

जंगल   पहाड़   पेड़    नदी   झील   परिंदे।
यानी   ज़मीं   किसी  ने  सजाई  हुई  तो है।

लोंगों के ज़हनो दिल में लगानी है इस दफ़ा।
शह्रों   में   आग   हमने   लगाई   हुई  तो है।

क्युं चल नहीं रही  हो  महब्बत की राह पर।
हमने   तुम्हें   वो   राह   बताई   हुई  तो  है।

जंगल   के   पेङ  काटने  वालों  ने  देखिये।
गमले  में  एक   पौध  लगाई   हुई   तो   है।

क़ैदी  बना  के  ज़िस्म  का इस रूह के लिये।
सर   पर  सभी  के   मौत  बिठाई   हुई तो है।

राजीव कुमार

Saturday, June 1, 2019

मर के ज़िन्दा हुआ मुझमें ये कोई और ही है।

ग़ज़ल

मर के  ज़िन्दा हुआ  मुझमें ये कोई और ही है।
हद से  गुजरा  हुआ मुझमें ये कोई और ही है।

मुझको जीना था सो हर ग़म से उबर आया हूं।
ग़म  में  डूबा  हुआ  मुझमे ये कोई और ही है।

अब  तो  देती  है  सूकूं  मुझको  मेरी  तन्हाई।
आह  भरता  हुआ मुझमें  ये कोई और ही है।

मैं  तो  रस्ते  में  हूँ पर   यार  मेरी मंज़िल पर।
थक के  बैठा  हुआ मुझमे ये कोई और ही है।

सबसे जीता हुआ मुझमें वो कोई और ही था।
ख़ुद से  हारा  हुआ मुझमें ये कोई और ही है।

अब  कोई  ऐसा  नहीं जिसको मनाऊं मैं भी।
मुझसे रूठा  हुआ  मुझमें ये कोई और ही है।

ज़िस्म  से रूह  ज़ुदा  यूं  ही  नहीं  हो सकती।
तुझसे बिछड़ा हुआ मुझमें ये कोई और ही है।

राजीव कुमार

Monday, May 27, 2019

सच कहूँ किस ख़ुशी से रौशन है।

ग़ज़ल

सच कहूँ किस ख़ुशी से रौशन है।
दिल तेरी आशिकी से रौशन है।

उसकी दीवानगी से मैं और वो।
मेरी दीवानगी से रौशन है।

ज़िन्दगी जुगनुओं की देखो तो।
अस्ल मे तीरगी से रौशन है।

पहले रौशन थी अपनी रंगत से।
अब मेरी शाइरी से रौशन है।

जो पहनना हो वो पहन लो पर।
हुस्न तो सादगी से रौशन है।

दोस्त चाहत का ये  समंदर भी।
हर तरफ तिश्नगी से रौशन है।

तेरी तस्वीर तेरा खत और मैं।
आज हर शय तुझी से रौशन है।

अच्छा लगता है जान कर मुझको
तेरी दुनिया मुझी से रौशन है

मैं जहाँ से हूँ वो शह्र यारों।
माँ सरीखी नदी से रौशन है।

राजीव कुमार

Sunday, May 26, 2019

दुनिया के इम्तिहान से डर जाऊँ क्या करूँ।

ग़ज़ल

दुनिया के इम्तिहान से डर जाऊँ क्या करूँ।
अपना ज़मीर बेच दूँ ? मर जाऊँ क्या करूँ।

कब तक लड़ूँगा अपने ही लोगों से रात दिन।
दिल पर ये बोझ ले के किधर जाऊँ क्या करूँ।

मुश्किल मेरे लिये है मुहब्बत में आप के ।
हद में रहूँ या हद से गुज़र जाऊँ क्या करूँ ।

नज़रों से अब गिरा ही दिया है तो बोल दो ।
दिल से भी मैं तुम्हारे उतर जाऊँ क्या करूँ

कुछ भी नहीं बचा है गमे हिज्र के सिवा ।
मैं टूट जाऊँ या के बिखर जाऊँ क्या करूँ

मंजिल भी पा गया तो अकेले करूंगा क्या।
जारी रखूँ सफ़र के ठहर जाऊँ क्या करूँ।

अब सोचने लगा हूँ मुहब्बत के नशे में ।
डूबा रहूँ या फिर से उबर जाऊँ क्या करूँ

राजीव कुमार

घरों से आ के बाहर बोल उट्ठे ।

ग़ज़ल

थे  जो  खामोश  वो सर बोल उट्ठे।
घरों  से  आ के  बाहर  बोल उट्ठे ।

सुबह  होते  ही  आंगन  के  परिंदे।
हमारी  छत पे  आ  कर  बोल उट्ठे।

तड़पते  देख कर प्यासा जमीं को।
ये सब बादल के लश्कर बोल उट्ठे।

कहाँ रहती है वो ख़्वाबों की रानी।
बस इतना सुन के पत्थर बोल उट्ठे।

किया एलान हमने इश्क़ का जब।
ज़माने  भर  के  खंजर  बोल उट्ठे।

जरूरत   से    ज्यादा  फैलते  ही।
मेरे    पैरों   से   चादर  बोल  उट्ठे।

फक़त इन्सान की है शक़्ल लेकिन।
मेरे  भाई  हैं   अजगर   बोल  उट्ठे।

हुकूमत आ के  लेटेगी  सड़क पर।
किसी दिन  गर ये  बेघर बोल उट्ठे।

राजीव कुमार

सच ये है कि जहां में दुआ के बग़ैर भी।

ग़ज़ल

सच ये है कि जहां में दुआ के बग़ैर भी।
ज़िन्दा हैं कुछ मरीज शिफा के बग़ैर भी

ऐसा नहीं कि मर गये हैं आप के बिना।
हम लोग जी रहे हैंं ख़ुदा के बग़ैर भी।

ख़तरा भी है उसी से ज़रूरी भी वही है
जलता नहीं चिराग़ हवा के बग़ैर भी

चलते हैं नैनीताल वहाँ दोस्त इन दिनों
बरसात हो रही है घटा के बग़ैर भी

उस शख़्स से सवाल भला कौन करेगा।
जिसको सज़ा मिली है ख़ता के बग़ैर भी

अब कुछ नहीं बचा है मुहब्बत में दोस्तों
अब इश्क़ हो रहा है वफ़ा के बग़ैर भी

राजीव कुमार

Monday, May 13, 2019

मुद्दे की बात ये है कि मुद्दा कोई नहीं।

ग़ज़ल

मुद्दे की बात ये है कि मुद्दा कोई नहीं।
हमको भी अब चुनाव की चिन्ता कोई नहीं।

उस दिन भी मरे भूख से वो कह रहे थे जब।
देखो मेरे निजाम में भूखा कोई नहीं

सर पे हर इक गरीब के छत देंगे इस दफा
वो कर रहा है जिसका भरोसा कोई नहीं

हम हैं तो सब हैं ठीक वगरना यहां पे तो।
हर आदमी ख़राब है अच्छा कोई नहीं

स्कूल अस्पताल खेत गांव जानवर
वाजिब है जो सवाल उठाता कोई नहीं

सूरत बदलने वाले बदलने लगे हैं नाम ।
हालात क्युं शहर के बदलता कोई नहीं

लोगों के मसअले हैं हुए जबसे दरकिनार
तब से किसी चुनाव में जीता कोई नहीं

राजीव कुमार
यू ट्यूब -- https://youtu.be/tueIBNZEW_U

Thursday, May 9, 2019

इससे पहले खाते धोखा छोड़ दिया।

ग़ज़ल

इससे   पहले  खाते  धोखा  छोड़ दिया।
प्यार  महब्बत  हमने करना छोड़ दिया।

इक  दूजे  के नाम  पे मरना छोड़  दिया।
यानी  अब  बेकार का रोना छोड़  दिया।

उस लङकी से प्यार निभाना मुश्किल है।
जिसने  हमको पकङा लूटा छोड़  दिया।

वहसत   उज़लत   नादानी  आवारापन।
देखो हमने सब कुछ अपना छोड़  दिया।

कोलेज  कैफ़े माल  सिनेमा  उसका घर।
वीरानों  में  और  भटकना  छोड़  दिया।

उन  आँखों  की  बात न  पूछो  जाने  दो।
जिन आँखो ने खुद को सूखा छोड़ दिया।

हमको  भी  आराम  मयस्सर  है  तब से।
जब  से हमने उनका सपना छोड़  दिया।

इक तितली इक फूल ये शबनम की बूंदें।
जाते  जाते  रात  ने   मक्ता  छोड़  दिया।

राजीव कुमार

Friday, May 3, 2019

ज़ीस्त बोतल शराब वाली है

ग़ज़ल

ज़ीस्त बोतल शराब वाली है ।
आधी बाक़ी है आधी ख़ाली है।

आँख काली है लब पे लाली है।
आपकी हर अदा निराली है।

जान तुम जानती नहीं तुमने ।
कितनी ग़ज़लों में जान डाली है।

इक तुम्हारा सूकून है वरना।
ये जो दुनिया है ये बवाली है।

उनको देखें तो ईद है अपनी।
वो भी देखें तो फिर दिवाली है।

जिस मुहल्ले में है तुम्हारा घर
वो हमारे लिये मनाली है

ज़ुल्फ, ख़ुशबू, लिबास और रंगत
जिस्म है गुल या गुल की डाली है

एक तन्हाई दूसरी सर्दी
कितनी बे-रहम रात साली है।

Jist botal sharab wali hai.
Adhi baki hai adhi khali hai.

Ankh kali hai lab pe lali hai.
Apki har ada nirali hai.

Jaan tum janti nahin tumne .
Kitni ghazlon main jaan dali hai.

Ek tumhara sukun hai warna.
Ye jo duniya hai ye bawali hai.

Unko dekhen to id hai apni.
Wo bhi dekhen to phir deewali hai

Jis mohalle main hai tumhara ghar.
Wo hamare liye manali hai

Julf khusbu libash or rangat
Jism hai gul ya gul ki dali hai

Ek tanhai dusari shardi
Kitni be raham raat sali hai.

राजीव कुमार

खुद को खुद ही उबार सकता हूं

ग़ज़ल

खुद को खुद ही उबार  सकता हूं
मैं हर इक शय नकार सकता हूं

बात ये है कि मरते मरते भी
अच्छे अच्छों को मार सकता हूं।

सिर्फ जुल्फ़ें नहीं तू चाहे तो।
तेरी क़िस्मत संवार सकता हूं।

यूं तो मुश्किल है पर तेरी ख़ातिर ।
जान ख़ुद को भी हार सकता हूं

तू भी सुनता नहीं मगर मौला।
मैं तुझे तो पुकार सकता हूं ।

राजीव कुमार

सच कहूँ गर तेरा पैगाम नहीं आएगा।

ग़ज़ल

सच कहूँ गर तेरा पैगाम नहीं आएगा।
नींद आ जायेगी आराम नहीं आएगा।

रंज शिकवा न वफ़ा इश्क़ न आँसू कोई।
बाद मेरे तेरे कुछ काम नहीं आएगा

लोग कहते हैं तेरे शह्र में ख़ुद ही चल कर।
ज़ह्र आ जायेगा पर जाम नहीं आएगा।

इस नये दौर की ग़ज़लों में नज़ाकत की जगह।
इक सिवा तेरे कोई नाम नहीं आएगा।

दर्द में आह में दुनिया में नशे में मुझमें
तेरा होना भी मेरे  काम नहीं आएगा

गर मेरे साथ चलोगी तो यकीं है मुझको
उम्र भर  गर्दिश ए अय्याम नहीं आएगा ।

हुस्न वालों को सहूलत है यही की उन पर ।
ज़ुर्म कर दें भी तो इल्ज़ाम नहीं आएगा।

आज तुम बेर लिए बैठी रहो शबरी जी
मुझको मालूम है अब राम नहीं आएगा

राजीव कुमार

ये हकीक़त है कि हर एक नहीं होता है

ग़ज़ल

ये हकीक़त है कि हर एक नहीं होता है
दिल की दुनियां में कोई नेक नहीं होता

जब तलक दिल में अतिरेक नहीं होता है
तब तलक एक भी मिस्टेक नहीं होता है

वो जो वाकिफ तुम्हारी हरेक आदत से
जान आशिक वो कभी फेक नहीं होता है

दिल ये कहता है नैनीताल में आकर यारों
ऐसा दिलकश भी कोई लेक नहीं होता है

शाइरी नौकरी परीवार आशिकी दुनिया
मेरा  किरदार कभी एक नहीं होता है।

राजीव कुमार

Wednesday, April 17, 2019

हर कदम सिर्फ इम्तिहान है क्या

ग़ज़ल

हर कदम सिर्फ इम्तिहान है क्या
मौला तेरा ही ये ज़हान है क्या

यार मुश्किल में तेरी जान है क्या
दौरे हाज़िर का तू किसान है क्या

आप भी हक़ बयान करते हैं
आपके मुँह में भी ज़बान है क्या

वो जो खाते है भूख पानी से।
उनके जीवन में इत्मीनान है क्या।

जितना चाहो ज़हर उगल आओ।
ये इलेक्शन भी पीकदान है क्या।

तुमने पिछली दफ़ा किया था जो।
कोई वादा तुम्हे भी ध्यान है क्या।

तेरी तकरीर में कहीं पर भी।
रोजी रोटी है और मकान है क्या।

राजीव कुमार

हो कर के बे ख़्याल अभी सो रहे हैं सब।

ग़ज़ल

हो कर के बे ख़्याल अभी सो रहे हैं सब।
किससे करें सवाल अभी सो रहे हैं सब।

मुश्किल में अब न डाल अभी सो रहे हैं सब
मत बोलियो रफाल अभी सो रहे हैं सब

इस दौर में किसान की है ये ही मुसीबत।
किसको सुनाये हाल अभी सो रहे हैं सब

गल भी गयी अगर तो इसे कौन खायेगा
चूल्हे पे रख के दाल अभी सो रहे हैं सब

कोई नहीं है साथ तेरे इन्क़लाब के
मत कर कोई बबाल अभी सो रहें हैं सब

इस बार के चुनाव में हो काम की बातें।
कैसे हो ये कमाल अभी सो रहें हैं सब

बिजली सड़क मकान दवा और नौकरी ।
मौला तु ही सम्भाल अभी सो रहे हैं सब

राजीव कुमार

फेर लेते हैं जो मुँह आप ये बोसा लेकर ।

ग़ज़ल

फेर  लेते  हैं  जो  मुँह  आप  ये  बोसा  लेकर ।
चैन   आयेगा   मुझे   आपसे    बदला   लेकर।

कौन  कहता  है  यहाँ  अपना  अक़ीदा लेकर।
लोग  कहते  हैं ग़ज़ल  आप  से मिसरा लेकर।

चाँद   आया  है   इधर  आप  सा  चेहरा लेकर।
अब  इधर   रात   न   आयेगी  अंधेरा   लेकर।

तुमको  देखा  तो मेरी  जान  ये  मालूम  हुआ।
फूल खिलते हैं  सुब्ह  हुस्न ये किसका लेकर।

एक  ही दर्द  है  हर  एक का  इक है  क़िस्सा।
शह्र-ए-उल्फ़त से वो जो आया है धोखा लेकर।

लोग   ईमान    लिये   हाथ   में   बैठे    देखे ।
जब कभी  हम भी  गये जेब  में पैसा  लेकर।

राजीव कुमार

आईने के सामने जब आईना रक्खा गया।

ग़ज़ल

आईने  के  सामने  जब   आईना  रक्खा  गया।
तब किसी का नाम शायद  बेवफ़ा रक्खा गया।

इम्तिहां  हर  सिम्त  मेरा  हमनवा रक्खा गया।
और   मुझसे   दूर  मेरा   रहनुमा  रक्खा  गया।

जब  जरूरत  ज़िन्दगी  की ज़िन्दगी लेने लगी।
तब से पैसा भी जहां का इक ख़ुदा रक्खा गया।

इक  परिंदा  पूछ  बैठा  क्या हुई  मुझसे खता।
क़ैद में  मुझको ख़ुदाया क्यूं  भला रक्खा गया।

क़त्ल करके ख़ुदकुशी का वो ख़ुशी हांसिल हुई।
जिसको पाने के  लिये मैं गमज़दा  रक्खा गया।

इस  समंदर  की हकीकत  साहिलों से  पूछिये।
जिनके  हिस्से तिश्नगी  का फैसला  क्खा गया।

रात   भर  तन्हाईयों में  मैं ग़ज़ल  कहने  लगा।
जबसे मुझको दूर तुझसे दिलरुबा रक्खा गया।

राजीव कुमार

जो अपने हाल पर खुश हो तो क्यूँ बे नूर रहते हो।

*ग़ज़ल*

जो अपने हाल पर खुश हो तो क्यूँ बे नूर रहते हो।
कहो किस डर से तुम भी हर घड़ी रंजूर रहते हो।

वो जो अख़बार में है  गर उसे तुम मानते हो सच।
तो अपने मुल्क के  सच से  बहुत ही दूर रहते हो।

तरक्की क्यूँ  नहीं चल कर  हमारे  पास आती है।
मुझे डर  है यही तुम  सोच कर  मजबूर रहते हो।

यहाँ पर  मजहबी  सैलाब  में जब  लोग  मरते हैं।
कभी  रोका  है जा कर  या वहाँ  से  दूर रहते हो?

बहुत अच्छा हुनर है झूठ को सच की तरह कहना।
मगर जब सच हो कहना तो कहाँ काफूर रहते हो।

गरीबी ज़ख्म है इस मुल्क़ के सीने पे तो क्या तुम।
कभी  बनते  हो  मरहम  या सदा नासूर  रहते हो?

तुम्हारी  देशभक्ति  पर  भरोसा  कौन   कर  लेगा!!
नसल  के नाम  पर  तुम भी  नशे में  चूर  रहते  हो।

राजीव कुमार

रंजूर - दुखी
क़ाफूर- गायब

मुहब्बत ख़ुद नहीं मरती तिज़ारत मार जाती है।

ग़ज़ल

मुहब्बत ख़ुद नहीं मरती तिज़ारत मार जाती है।
तुम्हारे  शह्र में हमको  शराफत मार जाती है ।

मसाइल में घिरी रहती है सबकी ज़िंदगी लेकिन ।
हुनर, औकात से ज्यादा की चाहत मार जाती है।

गले मिलते हैं होली पर ज़हन में ईद को रख कर।
ये रिश्ते यूँ नहीं मरते सियासत मार जाती है।

किसी भी मुल्क़ की ताकत वहाँ तालीम है यारों।
हो गर बुनियाद कच्ची तो ईमारत मार जाती है ।

हम अपने दुश्मनों के हाथ से मरते नहीं लेकिन ।
हमे फिरका परस्ती की विरासत मार जाती है।

राजीव कुमार

खुशामद कर रहे हैं खा रहे हैं

ग़ज़ल

खुशामद  कर  रहे  हैं  खा रहे हैं
ये  चैनल  बस हमें भरमा रहे हैं

हमारे दम से तो चलते हैं लेकिन
हमीं  पर  रोज  ये  गुर्रा  रहे  हैं।

कभी चूहा नहीं जो मार पाये
वो एंकर वर्दियों में आ रहे हैं

अजी हिन्दू मुसलमां को लड़ा कर
ये ससूरे  देश हित समझा रहे हैं ।

शहादत से नहीं मतलब है इनको।
ये बस टी आर पी चमका रहे हैं

अभी सरकार लाशें गिन रही है।
मगर  ये तीन  सौ  बतला रहे हैं

ये दंगल और हल्ला बोल करके
अजी बस शोर ही बरपा रहे हैं

किसी के झूठ को इक सच बता कर।
हमारे सच को बस झुठला रहे हैं।

जवाबों से हमें महरूम कर के।
सवालों में फक़त  उलझा रहे हैं।

ये जनता अपना रोना रो रही है।
ये चैनल अपना गाना गा रहे हैं।

बहस के नाम पर हर रोज देखो
गधे टीवी पे  रेंकें जा रहे हैं।

राजीव कुमार

शेयर करते रहें दोस्तों 🙏🙏🙏

Thursday, April 11, 2019

हक़ की बात करो तुम भी हक़दार बनो। हिन्दू मुस्लिम के मुद्दों की हार बनो।

ग़ज़ल

हक़ की बात करो तुम भी हक़दार बनो।
हिन्दू  मुस्लिम  के  मुद्दों  की  हार  बनो।

थोङा  नरम  बनो  थोङा   खुद्दार   बनो।
सोच  समझ  कर  यारों दुनियादार बनो।

नफ़रत  खून  ख़राबा  दंगा  आग  जनी।
आप  सियासत का  मत कारोबार बनो।

सहज सहल बनकर तो जीवन है मुश्किल।
जीने  की  ख़ातिर  कुछ तो  दुश्वार  बनो।

झूठ  ही लिखना  पढ़ना है  गर रोज तुम्हें।
क्युं  बनते हो  शायर  तुम  अख़बार बनो।

बन   जाते  हो  ढाल  अमीरों  के  अक्सर।
आप  गरीबों  का भी  तो  हथियार  बनो।

ख़्वाब  देखते  हो  क्युं  अफ़सर  बनने का।
जाओ   जा   के  पहले  चौकीदार  बनो।

राजीव कुमार

वो जिसके होने से निस्बत ख़राब होती है।

*ग़ज़ल*

वो जिसके होने से निस्बत ख़राब होती है।
मेरी  नज़र  में   वो  गैरत  ख़राब  होती है।

ये  मर्ज़े  इश्क  है इसके  मरीज़  की यारों।
दवा  के  नाम  से  हालत  ख़राब  होती है।

हमारी  छोड़िये  हम  तो अवाम हैं साहब।
हमारे  जैसों  की  क़िस्मत ख़राब होती है।

शहर  का  हाल  बदलते हैं नाम से पहले।
नहीं तो  नाम की अज़्मत ख़राब होती है।

कोई बताये जो रहबर है मुल्क़ का उसको।
किसी भी मुल्क़ में नफ़रत ख़राब होती है।।

राजीव कुमार

निस्बत- सम्बंध

दुनिया में दर्द है तो दवा भी है कोई चीज़।

ग़ज़ल

दुनिया  में दर्द  है तो दवा भी है कोई चीज़।
यानी की ज़िन्दगी में नशा भी है कोई चीज़।

क्युं दिल जला रहे हो किसी शख़्स के लिये।
क्या तुम भी सोचते हो वफ़ा भी है कोई चीज़

हम भी किसी के इश्क़ में तबतक रहे तबाह।
जबतक पता नहीं था जफ़ा भी है कोई चीज़

बस्ती की आग शहर तक आ जायेगी ज़रूर
क्युं भूलते हो आप  हवा भी है कोई चीज़।

मिल कर किसी से आज ये महसूस हुआ है
इक हुस्न ही नहीं है अदा भी है कोई चीज़ ।

दौलत की आग में ये बदन हो रहा है ख़ाक।
क्यो भूलते हो तुम की शिफ़ा भी है कोई चीज़।

आंखों से आज तक नहीं देखा गया मगर।
कहते हैं  इस जहां में खुदा भी है कोई चीज़।

राजीव कुमार

Wednesday, March 13, 2019

हम ने देखा ये हादसा अक़्सर

*ग़ज़ल*

हम   ने  देखा  ये    हादसा  अक़्सर।
जो  भी  चाहा  नहीं   मिला अक़्सर।
Hume dekha ye hadisa akksar
Jo bhi chaha nahi mila akksar

खुद के टुकड़ों को जोङ कर मुझको।
दिल  भी   देता  है  हौसला  अक़्सर।
Khud ke tukdon ko jod kar mujhko
Dil bhi deta hai housla akksar

उनकी  आंखों   की  झील  में  हमसा।
डूब    जाता    है    नाखुदा   अक़्सर।
Unki ankhon ki jheel main hum sa
Dub jata hai nakhuda akksar

इश्क़   हमने    नहीं   किया   क्युंकी।
फूट   जाता   है   बुल बुला   अक़्सर।
Ishq humane nahi kiya kyun ki
Fut jata hai bul bula akksar

एक    मैं     और     मेरी       तन्हाई।
साथ   करते   हैं    रतजगा   अक़्सर।
Ek main or meri tanhai
Sath karte hain ratjaga akksar

ये    इलेक्सन    है   इस  इलेक्शन में।
छूट    जाता   है   मसअला  अक़्सर।
Ye election hai is election main
Chut jata hai masaala akksar

अपनी   ग़ज़लों   से  इस  ज़माने को।
हम    दिखाते    हैं   आईना  अक़्सर।
Apni ghazlon se is jamane ko
Hum dikhate hain aaina akksar
राजीव कुमार
Rajeev Kumar
नाखुदा - नाव चलाने वाला
केवट

Wednesday, February 13, 2019

जो सच है गर उसे सच हमको बतलाना नहीं आता।

ग़ज़ल

जो सच है गर उसे सच हमको बतलाना नहीं आता।
तो  हमको  झूठ से  सचमुच में टकराना नहीं आता।

कहानी  का  वो  हिस्सा भी  नहीं लगता  कहानी  है।
कि  जिस हिस्से में  यारों कोई अफ़साना नहीं आता।

सफ़र  इस ज़िन्दग़ी   का  मुश्किलों से है भरा इसमें।
वही पाता  है  मंज़िल  जिसको घबराना नहीं आता।

दरो    दीवार    कुर्सी    मेज़   बिस्तर   और   तन्हाई।
किसी को तुमसे अच्छा मुझको समझाना नहीं आता।

घुटन  वहशत  परेशानी  ये सब  तब तक ही रहते हैं।
कि जब तक  सामने आंखों के मयख़ाना नहीं आता।

बताओ  कैसे   करते  हम  मुहब्बत  इस  ज़माने  में।
हमें  सर  मार  के  पत्थर  पे  मर  जाना नहीं आता।

मियां ये  शाइरी  उसके  लिये बिल्कुल नहीं जिसको।
ख़ुद  अपने  दर्द  के  ऊपर  ही मुस्काना नहीं आता।

राजीव कुमार

Monday, February 4, 2019

कभी यादें, कभी आँखोँ में पानी भेज देता है।

ग़ज़ल

कभी  यादें,  कभी  आँखोँ  में   पानी  भेज देता है।
वो  मुझको  हिज्र  की सारी  निशानी भेज  देता है।

वो खुद मिलने नहीं आता मगर हर रोज ख़्वाबों में।
ग़ज़ल  कहने  की ख़ातिर इक कहानी भेज देता है।

ये पागल दिल भी उनके इश्क के सरहद पे मरने को।
हमेशा   मेरे   हिस्से   की   जवानी   भेज   देता  है।

मुहब्बत से  उसे  कुछ  फोन  पर  कहने को बोलूं तो।
वो  अपनी  बात  मैसेज  की   जुबानी  भेज  देता है।

वो जिसको अपनी दुनिया मानते हैं वो ही जाने क्युं।
मेरी  दुनिया  में  अक्सर  सरगिरानी  भेज  देता  है।

नहीं  मरती  हैं  रूहें  इस  लिये  आदम की शक्लों में।
ख़ुदा  भी  सबकी  ख़ातिर  जिस्म फ़ानी भेज देता है।

राजीव कुमार

सरगिरानी- परेशानियों का अम्बार

Friday, February 1, 2019

जो भी कमा रहे हो वो ज़र किसके लिये है।

ग़ज़ल 

जो भी कमा रहे हो वो ज़र किसके लिये है।
जब कोई नहीं है तो ये घर किसके लिये है।

ऐसा न हो कि आईने में देख के खुद को
हम सोचने लगे कि ये डर किस के लिये है

इस शब के बाद भी वही वीरान सा ही दिन ।
ए दिल तुझे उम्मीद ए सहर किसके लिये है।

वो छत पे आ गये तो राज खुल गया ये की
 इस तरह बेकरार कमर किसके लिये है

हर सिम्त इक दीवार नयी उठ रही है अब
आख़िर ये पत्थरों का नगर किसके लिये है

मिल कर किसी से आज समझ आ गया हमको।
अपना भी ये जवान जिगर किसके लिये है

धोखा फरेब झूठ कज़ा और  नफरतें ।
दिल में तुम्हारे इतना ज़हर किसके लिये है

आखिर में जब हयात  सिफ़र होना ही है तो
ता उम्र मुश्किलों का सफ़र किसके लिये है

राजीव कुमार
ज़र - दौलत पैसा धन
शब - रात 
सहर - सुबह
क़मर- चाँद 
सिफर - शुन्य
हयात- जीवन

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...