ग़ज़ल
आईने के सामने जब आईना रक्खा गया।
तब किसी का नाम शायद बेवफ़ा रक्खा गया।
इम्तिहां हर सिम्त मेरा हमनवा रक्खा गया।
और मुझसे दूर मेरा रहनुमा रक्खा गया।
जब जरूरत ज़िन्दगी की ज़िन्दगी लेने लगी।
तब से पैसा भी जहां का इक ख़ुदा रक्खा गया।
इक परिंदा पूछ बैठा क्या हुई मुझसे खता।
क़ैद में मुझको ख़ुदाया क्यूं भला रक्खा गया।
क़त्ल करके ख़ुदकुशी का वो ख़ुशी हांसिल हुई।
जिसको पाने के लिये मैं गमज़दा रक्खा गया।
इस समंदर की हकीकत साहिलों से पूछिये।
जिनके हिस्से तिश्नगी का फैसला क्खा गया।
रात भर तन्हाईयों में मैं ग़ज़ल कहने लगा।
जबसे मुझको दूर तुझसे दिलरुबा रक्खा गया।
राजीव कुमार
आईने के सामने जब आईना रक्खा गया।
तब किसी का नाम शायद बेवफ़ा रक्खा गया।
इम्तिहां हर सिम्त मेरा हमनवा रक्खा गया।
और मुझसे दूर मेरा रहनुमा रक्खा गया।
जब जरूरत ज़िन्दगी की ज़िन्दगी लेने लगी।
तब से पैसा भी जहां का इक ख़ुदा रक्खा गया।
इक परिंदा पूछ बैठा क्या हुई मुझसे खता।
क़ैद में मुझको ख़ुदाया क्यूं भला रक्खा गया।
क़त्ल करके ख़ुदकुशी का वो ख़ुशी हांसिल हुई।
जिसको पाने के लिये मैं गमज़दा रक्खा गया।
इस समंदर की हकीकत साहिलों से पूछिये।
जिनके हिस्से तिश्नगी का फैसला क्खा गया।
रात भर तन्हाईयों में मैं ग़ज़ल कहने लगा।
जबसे मुझको दूर तुझसे दिलरुबा रक्खा गया।
राजीव कुमार
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