ग़ज़ल
घर-बार काम-धाम दोस्त-यार भी नहीं।
यानी कोई हमारा तरफदार भी नहीं।
जो तुम समझ रहे हो वो किरदार भी नहीं।
आसां नहीं हूं और मैं दुश्वार भी नहीं।
इक शख़्स ख़ुद से लड़ते हुए हो गया हलाक।
ये जीत गर नहीं तो कोई हार भी नहीं।
सरकार से सवाल करे ऐसा एक भी।
इस दौर में अब दोस्तों अख़बार भी नहीं।
क्या होगी इससे ज्यादा जहालत की और हद।
लोगों के हक में उनका ही सरदार भी नहीं।
हैरान हूँ मैं उनके इस अंदाज़ से कि वो
लड़ते हैं और हाथ में हथियार भी नहीं।
हर रोज़ मंज़िलें नई पाते हैं किस तरह
इस दर्ज़ा तेज आप की रफ़्तार भी नहीं।
सच बोल कर अकेले भला क्या करूंगा मैं।
सच जानने को अब कोई तैयार भी नहीं।
राजीव कुमार
घर-बार काम-धाम दोस्त-यार भी नहीं।
यानी कोई हमारा तरफदार भी नहीं।
जो तुम समझ रहे हो वो किरदार भी नहीं।
आसां नहीं हूं और मैं दुश्वार भी नहीं।
इक शख़्स ख़ुद से लड़ते हुए हो गया हलाक।
ये जीत गर नहीं तो कोई हार भी नहीं।
सरकार से सवाल करे ऐसा एक भी।
इस दौर में अब दोस्तों अख़बार भी नहीं।
क्या होगी इससे ज्यादा जहालत की और हद।
लोगों के हक में उनका ही सरदार भी नहीं।
हैरान हूँ मैं उनके इस अंदाज़ से कि वो
लड़ते हैं और हाथ में हथियार भी नहीं।
हर रोज़ मंज़िलें नई पाते हैं किस तरह
इस दर्ज़ा तेज आप की रफ़्तार भी नहीं।
सच बोल कर अकेले भला क्या करूंगा मैं।
सच जानने को अब कोई तैयार भी नहीं।
राजीव कुमार
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