ग़ज़ल
दुश्वारी को पांव पकङते देखा है
पल-पल अपना वक्त बिगङते देखा है
खोना पाना आना जाना जान गया
जिसने पत्ता पेड़ से झड़ते देखा है
आज तुम्हारा वक्त है वर्ना हमने भी
बड़े बड़ों को नाक रगड़ते देखा है
फुटपाथों पर बैठ के पढ़ने वालों को
यारों अपने आप से लड़ते देखा है।
मंजिल पाने की दुश्वारी क्या बोलूं
चींटी को दीवार पे चढ़ते देखा है?
वो शाइर जो शेर नहीं कह सकता था
उसको हमने आप को पढ़ते देखा है
इश्क करें या जोब इसी इक मुद्दे पर
अक्ल को दिल से अक्सर लङते देखा है।
राजीव कुमार
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