ग़ज़ल
खुश्बू तमाम शह्र में लाई हुई तो है।
यानी वो फिर ग़ज़ल से नहाई हुई तो है।
उम्मीद ज़िन्दगी की जगाई हुई तो है।
बोतल में कुछ शराब बचाई हुई तो है।
मंजिल नहीं मिलेगी भला कब तलक हमें।
रफ़्तार हमने अपनी बढ़ाई हुई तो है।
कुछ फायदा नहीं है छुपाने से दिल कि बात।
ये बात दिल में सबने दबाई हुई तो है।
जंगल पहाड़ पेड़ नदी झील परिंदे।
यानी ज़मीं किसी ने सजाई हुई तो है।
लोंगों के ज़हनो दिल में लगानी है इस दफ़ा।
शह्रों में आग हमने लगाई हुई तो है।
क्युं चल नहीं रही हो महब्बत की राह पर।
हमने तुम्हें वो राह बताई हुई तो है।
जंगल के पेङ काटने वालों ने देखिये।
गमले में एक पौध लगाई हुई तो है।
क़ैदी बना के ज़िस्म का इस रूह के लिये।
सर पर सभी के मौत बिठाई हुई तो है।
राजीव कुमार
खुश्बू तमाम शह्र में लाई हुई तो है।
यानी वो फिर ग़ज़ल से नहाई हुई तो है।
उम्मीद ज़िन्दगी की जगाई हुई तो है।
बोतल में कुछ शराब बचाई हुई तो है।
मंजिल नहीं मिलेगी भला कब तलक हमें।
रफ़्तार हमने अपनी बढ़ाई हुई तो है।
कुछ फायदा नहीं है छुपाने से दिल कि बात।
ये बात दिल में सबने दबाई हुई तो है।
जंगल पहाड़ पेड़ नदी झील परिंदे।
यानी ज़मीं किसी ने सजाई हुई तो है।
लोंगों के ज़हनो दिल में लगानी है इस दफ़ा।
शह्रों में आग हमने लगाई हुई तो है।
क्युं चल नहीं रही हो महब्बत की राह पर।
हमने तुम्हें वो राह बताई हुई तो है।
जंगल के पेङ काटने वालों ने देखिये।
गमले में एक पौध लगाई हुई तो है।
क़ैदी बना के ज़िस्म का इस रूह के लिये।
सर पर सभी के मौत बिठाई हुई तो है।
राजीव कुमार
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