ग़ज़ल
ये वक़्त हो के तुझसे ज़ुदा काट रहे हैं।
किस ज़ुर्म की हम यार सज़ा काट रहे हैं।
ग़म इसका नहीं बढ़ गयी है रात में सर्दी।
ग़म ये है कि हम तेरे बिना काट रहे हैं।
इक तेरे सिवा सब था कहानी में हमारी।
हम इसलिये क़िस्मत का लिखा काट रहे हैं।
सब चाहते हैं साफ हवा, ग्रीन नज़ारे।
फिर कौन हैं जो पेड़ हरा काट रहे हैं।
जब ख़त्म हुई धूप तो ये देख के तारे।
इस शब भी अंधेरे की रिदा काट रहे हैं।
ख़ामोश थे तो जान पे बन आयी हमारी।
इस वास्ते अब उनका कहा काट रहे हैं।
सर्दी में भवाली की खिली धूप का मंजर
हम लोग यहां दोस्त मजा काट रहे हैं।
राजीव कुमार
रिदा - चादर
ये वक़्त हो के तुझसे ज़ुदा काट रहे हैं।
किस ज़ुर्म की हम यार सज़ा काट रहे हैं।
ग़म इसका नहीं बढ़ गयी है रात में सर्दी।
ग़म ये है कि हम तेरे बिना काट रहे हैं।
इक तेरे सिवा सब था कहानी में हमारी।
हम इसलिये क़िस्मत का लिखा काट रहे हैं।
सब चाहते हैं साफ हवा, ग्रीन नज़ारे।
फिर कौन हैं जो पेड़ हरा काट रहे हैं।
जब ख़त्म हुई धूप तो ये देख के तारे।
इस शब भी अंधेरे की रिदा काट रहे हैं।
ख़ामोश थे तो जान पे बन आयी हमारी।
इस वास्ते अब उनका कहा काट रहे हैं।
सर्दी में भवाली की खिली धूप का मंजर
हम लोग यहां दोस्त मजा काट रहे हैं।
राजीव कुमार
रिदा - चादर
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