ग़ज़ल
दुनिया में दर्द है तो दवा भी है कोई चीज़।
यानी की ज़िन्दगी में नशा भी है कोई चीज़।
क्युं दिल जला रहे हो किसी शख़्स के लिये।
क्या तुम भी सोचते हो वफ़ा भी है कोई चीज़
हम भी किसी के इश्क़ में तबतक रहे तबाह।
जबतक पता नहीं था जफ़ा भी है कोई चीज़
बस्ती की आग शहर तक आ जायेगी ज़रूर
क्युं भूलते हो आप हवा भी है कोई चीज़।
मिल कर किसी से आज ये महसूस हुआ है
इक हुस्न ही नहीं है अदा भी है कोई चीज़ ।
दौलत की आग में ये बदन हो रहा है ख़ाक।
क्यो भूलते हो तुम की शिफ़ा भी है कोई चीज़।
आंखों से आज तक नहीं देखा गया मगर।
कहते हैं इस जहां में खुदा भी है कोई चीज़।
राजीव कुमार
दुनिया में दर्द है तो दवा भी है कोई चीज़।
यानी की ज़िन्दगी में नशा भी है कोई चीज़।
क्युं दिल जला रहे हो किसी शख़्स के लिये।
क्या तुम भी सोचते हो वफ़ा भी है कोई चीज़
हम भी किसी के इश्क़ में तबतक रहे तबाह।
जबतक पता नहीं था जफ़ा भी है कोई चीज़
बस्ती की आग शहर तक आ जायेगी ज़रूर
क्युं भूलते हो आप हवा भी है कोई चीज़।
मिल कर किसी से आज ये महसूस हुआ है
इक हुस्न ही नहीं है अदा भी है कोई चीज़ ।
दौलत की आग में ये बदन हो रहा है ख़ाक।
क्यो भूलते हो तुम की शिफ़ा भी है कोई चीज़।
आंखों से आज तक नहीं देखा गया मगर।
कहते हैं इस जहां में खुदा भी है कोई चीज़।
राजीव कुमार
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