ग़ज़ल
खुद को खुद ही उबार सकता हूं
मैं हर इक शय नकार सकता हूं
बात ये है कि मरते मरते भी
अच्छे अच्छों को मार सकता हूं।
सिर्फ जुल्फ़ें नहीं तू चाहे तो।
तेरी क़िस्मत संवार सकता हूं।
यूं तो मुश्किल है पर तेरी ख़ातिर ।
जान ख़ुद को भी हार सकता हूं
तू भी सुनता नहीं मगर मौला।
मैं तुझे तो पुकार सकता हूं ।
राजीव कुमार
खुद को खुद ही उबार सकता हूं
मैं हर इक शय नकार सकता हूं
बात ये है कि मरते मरते भी
अच्छे अच्छों को मार सकता हूं।
सिर्फ जुल्फ़ें नहीं तू चाहे तो।
तेरी क़िस्मत संवार सकता हूं।
यूं तो मुश्किल है पर तेरी ख़ातिर ।
जान ख़ुद को भी हार सकता हूं
तू भी सुनता नहीं मगर मौला।
मैं तुझे तो पुकार सकता हूं ।
राजीव कुमार
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