Friday, May 3, 2019

खुद को खुद ही उबार सकता हूं

ग़ज़ल

खुद को खुद ही उबार  सकता हूं
मैं हर इक शय नकार सकता हूं

बात ये है कि मरते मरते भी
अच्छे अच्छों को मार सकता हूं।

सिर्फ जुल्फ़ें नहीं तू चाहे तो।
तेरी क़िस्मत संवार सकता हूं।

यूं तो मुश्किल है पर तेरी ख़ातिर ।
जान ख़ुद को भी हार सकता हूं

तू भी सुनता नहीं मगर मौला।
मैं तुझे तो पुकार सकता हूं ।

राजीव कुमार

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