ग़ज़ल
थे जो खामोश वो सर बोल उट्ठे।
घरों से आ के बाहर बोल उट्ठे ।
सुबह होते ही आंगन के परिंदे।
हमारी छत पे आ कर बोल उट्ठे।
तड़पते देख कर प्यासा जमीं को।
ये सब बादल के लश्कर बोल उट्ठे।
कहाँ रहती है वो ख़्वाबों की रानी।
बस इतना सुन के पत्थर बोल उट्ठे।
किया एलान हमने इश्क़ का जब।
ज़माने भर के खंजर बोल उट्ठे।
जरूरत से ज्यादा फैलते ही।
मेरे पैरों से चादर बोल उट्ठे।
फक़त इन्सान की है शक़्ल लेकिन।
मेरे भाई हैं अजगर बोल उट्ठे।
हुकूमत आ के लेटेगी सड़क पर।
किसी दिन गर ये बेघर बोल उट्ठे।
राजीव कुमार
थे जो खामोश वो सर बोल उट्ठे।
घरों से आ के बाहर बोल उट्ठे ।
सुबह होते ही आंगन के परिंदे।
हमारी छत पे आ कर बोल उट्ठे।
तड़पते देख कर प्यासा जमीं को।
ये सब बादल के लश्कर बोल उट्ठे।
कहाँ रहती है वो ख़्वाबों की रानी।
बस इतना सुन के पत्थर बोल उट्ठे।
किया एलान हमने इश्क़ का जब।
ज़माने भर के खंजर बोल उट्ठे।
जरूरत से ज्यादा फैलते ही।
मेरे पैरों से चादर बोल उट्ठे।
फक़त इन्सान की है शक़्ल लेकिन।
मेरे भाई हैं अजगर बोल उट्ठे।
हुकूमत आ के लेटेगी सड़क पर।
किसी दिन गर ये बेघर बोल उट्ठे।
राजीव कुमार
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