ग़ज़ल
फूल खिलता नहीं देखा है तो क्या देखा है
उनका चेहरा नहीं देखा है तो क्या देखा है
ख्वाब देखे हैं बहुत तुमने मगर ख़्वाबों में
उसको पाना नहीं देखा है तो क्या देखा है
तुमने देखें हैं बहुत चाहने वाले लेकिन
मुझसा लङका नहीं देखा है तो क्या देखा है
अपने भीतर के बियाबान में ख़ुद को तुमने
गर भटकता नहीं देखा है तो क्या देखा है
दौरे हाज़िर की हकूमत के नुमाइन्दों सा।
तुमने झूठा नहीं देखा है तो क्या देखा है
शह्र दर शह्र महब्बत की हसीं गलियों में
ख़ून बहता नहीं देखा है तो क्या देखा है
राजीव कुमार
फूल खिलता नहीं देखा है तो क्या देखा है
उनका चेहरा नहीं देखा है तो क्या देखा है
ख्वाब देखे हैं बहुत तुमने मगर ख़्वाबों में
उसको पाना नहीं देखा है तो क्या देखा है
तुमने देखें हैं बहुत चाहने वाले लेकिन
मुझसा लङका नहीं देखा है तो क्या देखा है
अपने भीतर के बियाबान में ख़ुद को तुमने
गर भटकता नहीं देखा है तो क्या देखा है
दौरे हाज़िर की हकूमत के नुमाइन्दों सा।
तुमने झूठा नहीं देखा है तो क्या देखा है
शह्र दर शह्र महब्बत की हसीं गलियों में
ख़ून बहता नहीं देखा है तो क्या देखा है
राजीव कुमार
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