ग़ज़ल
दुनिया के इम्तिहान से डर जाऊँ क्या करूँ।
अपना ज़मीर बेच दूँ ? मर जाऊँ क्या करूँ।
कब तक लड़ूँगा अपने ही लोगों से रात दिन।
दिल पर ये बोझ ले के किधर जाऊँ क्या करूँ।
मुश्किल मेरे लिये है मुहब्बत में आप के ।
हद में रहूँ या हद से गुज़र जाऊँ क्या करूँ ।
नज़रों से अब गिरा ही दिया है तो बोल दो ।
दिल से भी मैं तुम्हारे उतर जाऊँ क्या करूँ
कुछ भी नहीं बचा है गमे हिज्र के सिवा ।
मैं टूट जाऊँ या के बिखर जाऊँ क्या करूँ
मंजिल भी पा गया तो अकेले करूंगा क्या।
जारी रखूँ सफ़र के ठहर जाऊँ क्या करूँ।
अब सोचने लगा हूँ मुहब्बत के नशे में ।
डूबा रहूँ या फिर से उबर जाऊँ क्या करूँ
राजीव कुमार
दुनिया के इम्तिहान से डर जाऊँ क्या करूँ।
अपना ज़मीर बेच दूँ ? मर जाऊँ क्या करूँ।
कब तक लड़ूँगा अपने ही लोगों से रात दिन।
दिल पर ये बोझ ले के किधर जाऊँ क्या करूँ।
मुश्किल मेरे लिये है मुहब्बत में आप के ।
हद में रहूँ या हद से गुज़र जाऊँ क्या करूँ ।
नज़रों से अब गिरा ही दिया है तो बोल दो ।
दिल से भी मैं तुम्हारे उतर जाऊँ क्या करूँ
कुछ भी नहीं बचा है गमे हिज्र के सिवा ।
मैं टूट जाऊँ या के बिखर जाऊँ क्या करूँ
मंजिल भी पा गया तो अकेले करूंगा क्या।
जारी रखूँ सफ़र के ठहर जाऊँ क्या करूँ।
अब सोचने लगा हूँ मुहब्बत के नशे में ।
डूबा रहूँ या फिर से उबर जाऊँ क्या करूँ
राजीव कुमार
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