Sunday, May 26, 2019

सच ये है कि जहां में दुआ के बग़ैर भी।

ग़ज़ल

सच ये है कि जहां में दुआ के बग़ैर भी।
ज़िन्दा हैं कुछ मरीज शिफा के बग़ैर भी

ऐसा नहीं कि मर गये हैं आप के बिना।
हम लोग जी रहे हैंं ख़ुदा के बग़ैर भी।

ख़तरा भी है उसी से ज़रूरी भी वही है
जलता नहीं चिराग़ हवा के बग़ैर भी

चलते हैं नैनीताल वहाँ दोस्त इन दिनों
बरसात हो रही है घटा के बग़ैर भी

उस शख़्स से सवाल भला कौन करेगा।
जिसको सज़ा मिली है ख़ता के बग़ैर भी

अब कुछ नहीं बचा है मुहब्बत में दोस्तों
अब इश्क़ हो रहा है वफ़ा के बग़ैर भी

राजीव कुमार

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