Monday, November 25, 2019

ग़ज़ल प्यार में जिससे धोखा खाया उससे ही फिर यारी की

ग़ज़ल

प्यार में जिससे धोखा खाया उससे ही फिर यारी की
तब जा कर ही समझ में आयीं बातें दुनियादारी की

दफ़्तर ओहदा फ़ाईल पब्लिक दोस्त पङोसी अपना घर
क्या बतलाऊं इस जीवन से कितनी मारा मारी की

उसे भूलाने की कोशिश में ख़ुद को ऐसे भूले हम
शब में दिन का बोझ उठाया दिन में शब-बेदारी की

जंगल फूल परिंदे पर्वत झील नदि आकाश हवा।
हमको ज़िन्दा रखने वालों से हमने गद्दारी की

शाम को तन्हा सिग्रेट पीते देख के मुझको कमरे में
खिड़की बिस्तर दरवाजों ने मुझसे बात तुम्हारी की।

बाबू सोना बेबी कह कर दिन भर पीछे घूमते हो
प्यार महब्बत ठीक है लेकिन लाज रखो खुद्दारी की

फोन उठाऊँ काल लगाऊं फिर सोचा कल देखेंगे।
बिछङ के उसकी याद आई तब हमने ये हुश्यारी की

सीख बुजुर्गों की ये अक़्सर काम हमारे आयी है
पहले अपना होश संभाला जंग की फिर तैय्यारी की

सच बोलो ये दौर तरक्की का है तो फिर इसमें क्युं
चीख रहे हैं पेड़ बेचारे सुनवाई है आरी की।

मंदिर मस्जिद के ये झगड़े खत्म नहीं होंगे तब तक
जब तक बस्ती वालों में है दहशत इक चिंगारी की।

राजीव कुमार

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