ग़ज़ल
किसी से हद से ज़्यादा आशिकी अच्छी नहीं रहती
बहुत नज़दीकियों में भी वो दिलचस्पी नहीं रहती
हवा बारिस उजाले हम नहीं महसूस कर पाते
अगर घर में हमारे एक भी खिङकी नहीं रहती
यकीनन अपना घर भी फूंक देते ये सियासतदां
जलाने के लिये गर शह्र में बस्ती नहीं रहती
ख़ुदा कहने लगे है खुद को जो इस मुल्क के उनको
कोई बतलाये ज़्यादा दिन भी ये कुर्सी नहीं रहती
निभा लेते हैं कैसे दुश्मनी कुछ लोग सारी उम्र
हमारे दिल में तो नाराज़गी तक भी नहीं रहती
बदन अपना तो रहता है मगर इस दुनिया फ़ानी में
जिसे हम रूह कहते हैं वही अपनी नहीं रहती
राजीव कुमार
किसी से हद से ज़्यादा आशिकी अच्छी नहीं रहती
बहुत नज़दीकियों में भी वो दिलचस्पी नहीं रहती
हवा बारिस उजाले हम नहीं महसूस कर पाते
अगर घर में हमारे एक भी खिङकी नहीं रहती
यकीनन अपना घर भी फूंक देते ये सियासतदां
जलाने के लिये गर शह्र में बस्ती नहीं रहती
ख़ुदा कहने लगे है खुद को जो इस मुल्क के उनको
कोई बतलाये ज़्यादा दिन भी ये कुर्सी नहीं रहती
निभा लेते हैं कैसे दुश्मनी कुछ लोग सारी उम्र
हमारे दिल में तो नाराज़गी तक भी नहीं रहती
बदन अपना तो रहता है मगर इस दुनिया फ़ानी में
जिसे हम रूह कहते हैं वही अपनी नहीं रहती
राजीव कुमार
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