Saturday, December 7, 2019

शूरू होने लगी है दास्ताँ आहिस्ता आहिस्ता ।

ग़ज़ल

शूरू होने लगी है दास्ताँ आहिस्ता आहिस्ता ।
वो हम पर हो रहा है मेहरबाँ आहिस्ता आहिस्ता ।

युं ही मिलते रहे तो ख़त्म हो जायेगी हर दूरी ।
हमारे और तुम्हारे दर्मियाँ आहिस्ता आहिस्ता।

ज़रूरी है बहुत तालीम की बुनियाद बच्चों में ।
तभी तामीर होता है मकाँ आहिस्ता आहिस्ता।

तुम्हें हक़ चाहिये तो सर उठाना सीख लो वर्ना।
सितम ढाता रहेगा हुक्मराँ आहिस्ता आहिस्ता।

सङक पर इस तरह होने लगे इन्साफ तो इक दिन
वतन हो जायेगा फिर रायगाँ आहिस्ता आहिस्ता।

निकलकर दोस्तों नाकामियों की ज़द से हमको भी।
ज़मीं पर खींचना है आसमाँ आहिस्ता आहिस्ता।

ये दुनिया दौलतें उल्फ़त वफ़ा ईमान हर इक ग़म
हमारे साथ होंगे रफ़्तगाँ आहिस्ता आहिस्ता

राजीव कुमार

रायगाँ- बर्बाद
रफ़्तगाँ- मृत

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