ग़ज़ल
वीराने को वहशत ज़िन्दा रखती है।
यानी प्यार को फ़ुर्क़त ज़िन्दा रखती है।
दीवानी को ताअत ज़िन्दा रखती है।
दीवाने को शिद्दत ज़िन्दा रखती है।
हर पल एक अजीयत ज़िन्दा रखती है।
जिन लोगों को गुर्बत ज़िन्दा रखती है।
घर आंगन की सूरत ज़िन्दा रखती हैं।
उन दीवारों को छत ज़िन्दा रखती है।
यूं तो हर इक चीज़ की कीमत है लेकिन।
किरदारों को ग़ैरत ज़िन्दा रखती है।
रिन्दों की ख़ातिर हैं ये मयखाने पर।
मुझको इक तेरी लत ज़िन्दा रखती है।
वहशत खा जाती है लाखों लोगो को।
मुल्क़ को यारो वहदत ज़िन्दा रखती है।
सच बोले तो शाम तलक मर जायेगे।
जिन लोगों को गीबत ज़िन्दा रखती है।
जीते जी कुछ लोग हैं मुर्दों की मांनिंद।
कुछ लोगों को तुर्बत ज़िन्दा रखती है।
सरहद में रह कर तो ये मर जायेंगी।
कुछ चिङीयों को हिजरत ज़िन्दा रखती है।
शह्रों की सांसें चलती हैं दौलत से।
गांवों को तो इज्ज़त ज़िन्दा रखती है।
राजीव कुमार
फुर्कत- बिछङना / ताअत- समर्पण, श्रद्धा / अजीयत- तकलीफ़ दुःख / गुर्बत- ग़रीबी/ वहदत- एकता / गीबत - पीठ पीछे बुराई / तुर्बत- मकबरा / हिजरत- प्रवास
वीराने को वहशत ज़िन्दा रखती है।
यानी प्यार को फ़ुर्क़त ज़िन्दा रखती है।
दीवानी को ताअत ज़िन्दा रखती है।
दीवाने को शिद्दत ज़िन्दा रखती है।
हर पल एक अजीयत ज़िन्दा रखती है।
जिन लोगों को गुर्बत ज़िन्दा रखती है।
घर आंगन की सूरत ज़िन्दा रखती हैं।
उन दीवारों को छत ज़िन्दा रखती है।
यूं तो हर इक चीज़ की कीमत है लेकिन।
किरदारों को ग़ैरत ज़िन्दा रखती है।
रिन्दों की ख़ातिर हैं ये मयखाने पर।
मुझको इक तेरी लत ज़िन्दा रखती है।
वहशत खा जाती है लाखों लोगो को।
मुल्क़ को यारो वहदत ज़िन्दा रखती है।
सच बोले तो शाम तलक मर जायेगे।
जिन लोगों को गीबत ज़िन्दा रखती है।
जीते जी कुछ लोग हैं मुर्दों की मांनिंद।
कुछ लोगों को तुर्बत ज़िन्दा रखती है।
सरहद में रह कर तो ये मर जायेंगी।
कुछ चिङीयों को हिजरत ज़िन्दा रखती है।
शह्रों की सांसें चलती हैं दौलत से।
गांवों को तो इज्ज़त ज़िन्दा रखती है।
राजीव कुमार
फुर्कत- बिछङना / ताअत- समर्पण, श्रद्धा / अजीयत- तकलीफ़ दुःख / गुर्बत- ग़रीबी/ वहदत- एकता / गीबत - पीठ पीछे बुराई / तुर्बत- मकबरा / हिजरत- प्रवास
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