ग़ज़ल
झूठ या सच लिखे कलम पर है
फिर भी दारोमदार हम पर है
मौत पर अपना बस नहीं है और
ज़िन्दगी जाने किसके दम पर है
बोलो इल्ज़ाम मौत का मेरे
दैर पर है या के हरम पर है
मुझको आज़ाद मुझसे कर देगा
कितनी उम्मीद बे रहम पर है
भूख वहशत लङाई बेकारी।
अब जहालत भी तो चरम पर है
मुल्क़ मज़हब ज़मीन का झगड़ा
सिर्फ़ और सिर्फ़ इक अहम पर है
आप जो चाहते हैं पा जायें
ये भी तो आप के करम पर है
सर्दी ए नैनीताल में यारों ।
इक भरोसा है वो भी रम पर है।
राजीव कुमार
झूठ या सच लिखे कलम पर है
फिर भी दारोमदार हम पर है
मौत पर अपना बस नहीं है और
ज़िन्दगी जाने किसके दम पर है
बोलो इल्ज़ाम मौत का मेरे
दैर पर है या के हरम पर है
मुझको आज़ाद मुझसे कर देगा
कितनी उम्मीद बे रहम पर है
भूख वहशत लङाई बेकारी।
अब जहालत भी तो चरम पर है
मुल्क़ मज़हब ज़मीन का झगड़ा
सिर्फ़ और सिर्फ़ इक अहम पर है
आप जो चाहते हैं पा जायें
ये भी तो आप के करम पर है
सर्दी ए नैनीताल में यारों ।
इक भरोसा है वो भी रम पर है।
राजीव कुमार
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