Monday, November 25, 2019

झूठ या सच लिखे कलम पर है

ग़ज़ल

झूठ या सच लिखे कलम पर है
फिर भी दारोमदार हम पर है

मौत पर अपना बस नहीं है और
ज़िन्दगी जाने किसके दम पर है

बोलो इल्ज़ाम मौत का मेरे
दैर पर है या के हरम पर है

मुझको आज़ाद मुझसे कर देगा
कितनी उम्मीद बे रहम पर है

भूख वहशत लङाई बेकारी।
अब जहालत भी तो चरम पर है

मुल्क़ मज़हब ज़मीन का झगड़ा
सिर्फ़ और सिर्फ़ इक अहम पर है

आप जो चाहते हैं पा जायें
ये भी तो आप के करम पर है

सर्दी ए नैनीताल में यारों ।
इक भरोसा है वो भी रम पर है।

राजीव कुमार

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