Thursday, November 28, 2019

इस तरह इश्क़ सर पे तारी है ज़िन्दगी ज़िन्दगी पे भारी है

ग़ज़ल

इस तरह इश्क़ सर पे तारी है
ज़िन्दगी ज़िन्दगी पे भारी है

ज़िन्दगी इक दरख्त है उस पर
वक़्त जैसे कि क़ोई  आरी है

ज़िस्म अपना तो है मगर जां पर
सारी दुनिया की दावेदारी है

झूठ हम बोलते नहीं लेकिन
सच बताने में रिस्क भारी है

हम समझते थे फूल है जिसको
उसकी कांटों से रिश्तेदारी है

हमसे वो ही सवाल करते हैं
जिनकी हम से जवाबदारी है

वो हमारी है जान और वो ही
दुश्मन ए जान भी हमारी है

राजीव कुमार

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