ग़ज़ल
इस तरह इश्क़ सर पे तारी है
ज़िन्दगी ज़िन्दगी पे भारी है
ज़िन्दगी इक दरख्त है उस पर
वक़्त जैसे कि क़ोई आरी है
ज़िस्म अपना तो है मगर जां पर
सारी दुनिया की दावेदारी है
झूठ हम बोलते नहीं लेकिन
सच बताने में रिस्क भारी है
हम समझते थे फूल है जिसको
उसकी कांटों से रिश्तेदारी है
हमसे वो ही सवाल करते हैं
जिनकी हम से जवाबदारी है
वो हमारी है जान और वो ही
दुश्मन ए जान भी हमारी है
राजीव कुमार
इस तरह इश्क़ सर पे तारी है
ज़िन्दगी ज़िन्दगी पे भारी है
ज़िन्दगी इक दरख्त है उस पर
वक़्त जैसे कि क़ोई आरी है
ज़िस्म अपना तो है मगर जां पर
सारी दुनिया की दावेदारी है
झूठ हम बोलते नहीं लेकिन
सच बताने में रिस्क भारी है
हम समझते थे फूल है जिसको
उसकी कांटों से रिश्तेदारी है
हमसे वो ही सवाल करते हैं
जिनकी हम से जवाबदारी है
वो हमारी है जान और वो ही
दुश्मन ए जान भी हमारी है
राजीव कुमार
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