ग़ज़ल
जाना कहाँ था और कहाँ जा रहे हैं हम
वहशत की ज़द में देखिये फिर आ रहे है हम
अपनो से अपने घर में ही घबरा रहे हैं हम
इन्सानियत को देख के शरमा रहे हैं हम
ये जान कर भी कोई नहीं सुन रहा है पर
जम्हूरियत के दश्त में चिल्ला रहे हैं हम
हर एक सांस अपनी कज़ा करके रात दिन
इस ज़िन्दगी को रोज़ रोज़ खा रहे हैं हम
हर फैसला खिलाफ़ है जिसका अवाम के
यारो अब उस निज़ाम को ठुकरा रहे हैं हम
जिस अहद में दस्तूर झूठ बोलने का था
उस अहद में सच बोल के पछता रहे हैं हम
तू कह रहा है तो ये तेरा शह्र छोङ कर
जाने का मन नहीं है मगर जा रहे हैं हम
राजीव कुमार
जाना कहाँ था और कहाँ जा रहे हैं हम
वहशत की ज़द में देखिये फिर आ रहे है हम
अपनो से अपने घर में ही घबरा रहे हैं हम
इन्सानियत को देख के शरमा रहे हैं हम
ये जान कर भी कोई नहीं सुन रहा है पर
जम्हूरियत के दश्त में चिल्ला रहे हैं हम
हर एक सांस अपनी कज़ा करके रात दिन
इस ज़िन्दगी को रोज़ रोज़ खा रहे हैं हम
हर फैसला खिलाफ़ है जिसका अवाम के
यारो अब उस निज़ाम को ठुकरा रहे हैं हम
जिस अहद में दस्तूर झूठ बोलने का था
उस अहद में सच बोल के पछता रहे हैं हम
तू कह रहा है तो ये तेरा शह्र छोङ कर
जाने का मन नहीं है मगर जा रहे हैं हम
राजीव कुमार
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