ग़ज़ल
सहराओं में बादल की रिदा ओढ़ के निकले।
जब घर से बुज़ुर्गों की दुआ ओढ़ के निकले।
हम जानते थे मुश्किलें आयेगी सफर में।
हम इस लिये हिम्मत की क़बा ओढ़ के निकले।
तू आये तो एज़ाज ये हासिल हो चमन को।
जो फूल खिले रंग तेरा ओढ़ के निकले।
मर कर भी जी रहे हैं वही आज तक यहां।
जो दिल में महब्बत की बक़ा ओढ़ के निकले।
चेहरे पे एक चेहरा सभी के है कहो तुम।
इस शह्र में हम कैसे वफा ओढ़ के निकले।
खतरा था भटकने का सो हम अपने बदन पर ।
चादर की जगह अपना पता ओढ़ के निकले।
राजीव कुमार
सहराओं - मरुस्थल
रिदा - चादर
बक़ा - अमरत्व
क़बा- चोला वस्त्र
सहराओं में बादल की रिदा ओढ़ के निकले।
जब घर से बुज़ुर्गों की दुआ ओढ़ के निकले।
हम जानते थे मुश्किलें आयेगी सफर में।
हम इस लिये हिम्मत की क़बा ओढ़ के निकले।
तू आये तो एज़ाज ये हासिल हो चमन को।
जो फूल खिले रंग तेरा ओढ़ के निकले।
मर कर भी जी रहे हैं वही आज तक यहां।
जो दिल में महब्बत की बक़ा ओढ़ के निकले।
चेहरे पे एक चेहरा सभी के है कहो तुम।
इस शह्र में हम कैसे वफा ओढ़ के निकले।
खतरा था भटकने का सो हम अपने बदन पर ।
चादर की जगह अपना पता ओढ़ के निकले।
राजीव कुमार
सहराओं - मरुस्थल
रिदा - चादर
बक़ा - अमरत्व
क़बा- चोला वस्त्र
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