Thursday, December 5, 2019

हवा में ख़ुशबुएँ लाये फ़जा के लहजे में

ग़ज़ल

हवा में  ख़ुशबुएँ लाये फ़जा के लहजे में
क़ोई तो फूल खिलाये दुआ के लहजे में

लबों पे आज वही है सदा के लहजे में ।
वो दर्द जो था किसी इंतेहा के लहजे में ।

नमीं लबों पे निगाहों में बिजलियां लेकर ।
बरस रही थी वो मुझ पर घटा के लहजे में

फरेब खा के भी उस पर यकीन है सबको
यही कमाल है उस बेवफा के लहजे में।

उसी से हमको शिफा की है सारी उम्मीदें
जो दर्द देने लगा है दवा के लहजे में।

शज़र पे होने लगा ज़ुल्म तो ये जंगल के
परिंदे चीख उठे इल्तिजा के लहजे में।

वो हमको छोङ गया तब यकीन ये आया
अब और कोई नहीं है ख़ुदा के लहजे में।

राजीव कुमार

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