ग़ज़ल
नींद का ख़्वाब से इस बार ये सौदा कर लूं
तुमको देखुंगा मगर पहले अंधेरा कर लूं
इस तरह तुझपे मेरी जान मैं कब्ज़ा कर लूं
चाहता हूं तेरे हर ग़म को मैं अपना कर लूं
एक मुद्दत से अधूरा हूं इसी ख़्वाहिश में
तुम जो मिल जाओ तो ख़ुद को भी मैं पूरा कर लूं
अब तेरे शह्र में कोई भी नहीं है तुझ सा।
जिसके ईमान पे मैं यूं ही भरोसा कर लूं।
तू हवाओं की तरफ है तो क्या इस इक डर से।
मैं अंधेरों में चरागों से किनारा कर लूं
उसको अब मेरी ज़रूरत ही नहीं तो मैं भी।
उससे अब ख़त्म महब्बत का ये क़िस्सा कर लूं
हद से गुजरा ये ग़मे हिज़्र तो दिल में आया
हिज्र का लुत्फ़ किसी बार में अब जाकर लूं
राजीव कुमार
नींद का ख़्वाब से इस बार ये सौदा कर लूं
तुमको देखुंगा मगर पहले अंधेरा कर लूं
इस तरह तुझपे मेरी जान मैं कब्ज़ा कर लूं
चाहता हूं तेरे हर ग़म को मैं अपना कर लूं
एक मुद्दत से अधूरा हूं इसी ख़्वाहिश में
तुम जो मिल जाओ तो ख़ुद को भी मैं पूरा कर लूं
अब तेरे शह्र में कोई भी नहीं है तुझ सा।
जिसके ईमान पे मैं यूं ही भरोसा कर लूं।
तू हवाओं की तरफ है तो क्या इस इक डर से।
मैं अंधेरों में चरागों से किनारा कर लूं
उसको अब मेरी ज़रूरत ही नहीं तो मैं भी।
उससे अब ख़त्म महब्बत का ये क़िस्सा कर लूं
हद से गुजरा ये ग़मे हिज़्र तो दिल में आया
हिज्र का लुत्फ़ किसी बार में अब जाकर लूं
राजीव कुमार
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