Friday, October 18, 2019

हरबार जिसको हमसे ही जुर्माना चाहिये।

ग़ज़ल

हरबार जिसको हमसे ही जुर्माना चाहिये।
हमको भी उस निजाम को ठुकराना चाहिये।

जंगल नदी पहाड़ वतन सब हैं अब तबाह।
अब तो हुज़ूर आप को पछताना चाहिये।

चल ही नहीं रही है हुकूमत जो तुम से तो।
कुर्सी से तुमको यार  उतर जाना चाहिए।

खाली है पेट जेब भी खाली है आजकल।
तुमको तो इस विकास पे इतराना चाहिए।

वहशत की ज़द में आ गया है गर ये जहां तो
हमको  हमारे   वक्त   पे   शर्माना  चाहिये।

सच बोलना है बोलिए पर याद ये रहे।
सच बोल के इस दौर में घबराना चाहिए।

बन जाये गरचे क़ैद हमारा ही जिस्म तो।
भीतर से हमको खुद के निकल जाना चाहिये।

राजीव कुमार

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