ग़ज़ल
अपने चेहरे पे नया चेहरा लगा भी न सकूँ।
आईना देख के मैं खुद को छुपा भी न सकूँ।
ये जो किस्सा है महब्बत का मिरे सीने में
ये वो किस्मत का लिखा है जो मिटा भी न सकूँ।
चन्द टुकड़े है ये कागज के मगर जाने क्युँ
खत तेरे चाहूँ जला दूं तो जला भी न सकूँ।
जिस्म की हद से निकलने का यही था मकसद
तू बुलाये तो कभी लौट के आ भी न सकूँ
चोट खा कर ये मेरा दिल भी किसी बच्चे सा।
जब भी रोये मैं इसे हस के हसा भी न सकूँ।
ये जमाना है जमाने से गिला क्या करना।
खुद से लड़ के मैं अगर खुद को मिटा भी न सकूँ
राजीव कुमार
अपने चेहरे पे नया चेहरा लगा भी न सकूँ।
आईना देख के मैं खुद को छुपा भी न सकूँ।
ये जो किस्सा है महब्बत का मिरे सीने में
ये वो किस्मत का लिखा है जो मिटा भी न सकूँ।
चन्द टुकड़े है ये कागज के मगर जाने क्युँ
खत तेरे चाहूँ जला दूं तो जला भी न सकूँ।
जिस्म की हद से निकलने का यही था मकसद
तू बुलाये तो कभी लौट के आ भी न सकूँ
चोट खा कर ये मेरा दिल भी किसी बच्चे सा।
जब भी रोये मैं इसे हस के हसा भी न सकूँ।
ये जमाना है जमाने से गिला क्या करना।
खुद से लड़ के मैं अगर खुद को मिटा भी न सकूँ
राजीव कुमार
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