ग़ज़ल
सकूं मिला न कहीं हर घङी उदास रहा।
कि तेरे बाद मैं जब तक अदब शनास रहा।
मेरी गज़ल में तेरा इस तरह निवास रहा
मैं दूर हो के भी तेरे ही आस पास रहा
तुम्हारे आने से पहले न मौत आ जाये
तमाम उम्र यही दिल में इक हिरास रहा
(हिरास-डर)
वो मैं नहीं था कोई और था मेरे भीतर
जो मुझसे ज्यादा तेरे गम से बद हवास रहा
तबाह जिसने किया उसका ही नजाने क्युं
हमेशा मैं भी मेरे दोस्त पुर सिपास रहा
(पुर सिपास-आभारी Thankful)
तुम्हारे झूठ यहां पैरहन बदलते रहे
हमारा सच तो हर इक रोज बे लिबास रहा।
राजीव कुमार
सकूं मिला न कहीं हर घङी उदास रहा।
कि तेरे बाद मैं जब तक अदब शनास रहा।
मेरी गज़ल में तेरा इस तरह निवास रहा
मैं दूर हो के भी तेरे ही आस पास रहा
तुम्हारे आने से पहले न मौत आ जाये
तमाम उम्र यही दिल में इक हिरास रहा
(हिरास-डर)
वो मैं नहीं था कोई और था मेरे भीतर
जो मुझसे ज्यादा तेरे गम से बद हवास रहा
तबाह जिसने किया उसका ही नजाने क्युं
हमेशा मैं भी मेरे दोस्त पुर सिपास रहा
(पुर सिपास-आभारी Thankful)
तुम्हारे झूठ यहां पैरहन बदलते रहे
हमारा सच तो हर इक रोज बे लिबास रहा।
राजीव कुमार
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