Monday, December 1, 2014

आने से पहले मौत मजा चाहते हैं लोग।

गजल-राजधानी दिल्ली के एम्स हस्पताल से होते हुए आप तक
आने से पहले मौत मजा चाहते हैं लोग।
हर कर्ज जिन्दगी का अदा चाहते हैं लोग
ये भीङ हस्पताल की कहती है चीख कर।
दर्दों के सताये हैं दवा चाहते हैं लोग।
दुनियां में लाईलाज मर्ज जब से हो गये।
तब से दवा के साथ दुआ चाहते हैं लोग।
कंधे पे ढो रहे हैं खुद अपने ही जिस्म को।
सीने में जिन्दगी की हवा चाहते हैं लोग।
आखिर में जंग हारने का गम नहीं कोई।
जीने का वक्त और जरा चाहते हैं लोग।
दिल के मरीज जितने थे सबने यही कहा।
हर रोज जख्म दिल पे नया चाहते है लोग।
जाने भी दीजिए मैं गजल और क्या कहुं।
अश्कों से जो निकले वो सदा चाहते हैं लोग ।
राजीव कुमार

हुआ सख्त है तब बगावत का लहजा।

उन्वान पर कोशिश

हुआ सख्त है तब बगावत का लहजा।
तिजारत बनी जब हूकूमत का लहजा।

जूबां पे नफासत मगर दिल में शोले ।
यही आजकल है सियासत का लहजा ।

वही जूर्म सारे अदालत वही हैं।
सभी को पता है वकालत का लहजा

तरक्की के इस दौर की है हकीकत।
सदाकत नहीं है सदाकत का लहजा ।

सिखाया नहीं बैर मजहब ने तो फिर।
है क्यूं हर किसी का अदावत का लहजा।

जरूर एक दिन आयेंगे अच्छे दिन भी ।
मगर पहले सीखो मुहब्बत का लहजा ।

राजीव कुमार

मैं भी इक दिन जवाब दे दुंगा।

एक मतला और कुछ 🐅

मैं भी इक दिन जवाब दे दुंगा।
सबको सबका हिसाब दे दुंगा।

सारे किस्से कहानियों की मैं।
लिख के कोई किताब दे दुंगा।

ए समंदर मैं आज सहरा को।
तेरे हिस्से का आब दे दुंगा।

जिनसे आंखो की शर्म रखता था।
उनको आंखो से ताब दे दुंगा।

मुफलीशी जब कभी तू मांगेगी।
अच्छे दिन के खुवाब दे दुंगा।

वक्त तारीख कोई बन कर मैं।
कुछ तुझे भी खराब दे दुंगा।

तितलियां दर ब दर न होना तुम।
तुमको खिलता गुलाब दे दुंगा।

आइना सच बता न पायेगा ।
मै हर इक को नकाब दे दुंगा।

राजीव कुमार

मेरा वजूद भी अब तक मिटा नहीं पाया ।

नयी गजल पेश ए खिदमत

मेरा वजूद भी अब तक मिटा नहीं पाया ।
सफर हयात का मुझको थका नहीं पाया ।

गुलों से खुश्बू ए गुलसन उङा नहीं पाया ।
वो भौरा रंगत ए गुल भी चुरा नहीं पाया।

हजार जख्म थे सीने पे इस लिये शायद।
नजर रकीब भी मुझसे मिला नहीं पाया।

मेरा मिजाज भी कुछ उस दरख्त जैसा है।
कोई तूफान भी जिसको गिरा नहीं पाया ।

बहुत से रहनुमा आये हमारी बस्ती में।
कोई भी झुग्गीयां लेकिन हटा नहीं पाया।

न जाने कैसे वो अच्छे दिनों को लायेगा।
जो अम्नो चैन अभी तक तो ला नहीं पाया।

वो जिसके नाम के पत्थर भी तैर जाते थे।
वही तो नाव भी अपनी बचा नहीं पाया।

तङपते भूख से बच्चो को आज तक शायर।
कलाम अपने सुना कर हसा नहीं पाया।

हर एक हाल मे जिन्दा वफा रही मेरी ।
तिरंगा मेरा वो दुश्मन झुका नहीं पाया ।

राजीव कुमार

मेरे दिल में उतर कर रह गया हैं

ताजा गजल आप सभी के लिये

मेरे दिल में उतर कर रह गया हैं
तेरी यादो का नश्तर रह गया है

जो तेरे संग बीता था वो लम्हा।
वही आंखों में मंजर रह गया है

जला हे दिल मेरा उल्फत में जब से।
धुआं सिने के अन्दर रह गया है

मेरे उपर उछाला हर किसी ने।
तेरे हाथों में पत्थर रह गया हे।

सफर पर साथ तो निकला था मेरे।
मगर रस्ते में रहबर रह गया है।

किया है कत्ल जबसे दुश्मनी का।
बहुत मायूस खंजर रह गया है।

जरा बदली जो छायी आसमां में ।
सहम कर मेरा छप्पर रह गया है।

खुदाया इस जहां में हर कोई क्युं।
मसाइल में उलझ कर रह गया हैं।

इसी दुनिया में ये इन्सान भी तो।
फकत सर्कस का जोकर रह गया है।

राजीव कुमार

Wednesday, November 12, 2014

जब से तेरा फ़ितूर मेरे सर पे चढ़ गया/

गजल हजल मिक्स कुछ हट के पहली और आखिरी

जब से तेरा फ़ितूर मेरे सर पे चढ़ गया/
हसरत की सीढ़ियों से मैं अम्बर पे चढ़ गया /

शीशे के थे आरमां मेरे पत्थर थी ये दुनिया ।
शीशा उठा के हाथ में पत्थर पे चढ गया ।

दर्दो सितम के खौफ से डरता है कौन अब ।
दिल देख ले मेरा तेरे खंजर पे चढ गया।

नेता को तो हर बूंद में हिस्सा ही चाहिये ।
पीता लहूं वो देख के मच्छर पे चढ गया

खादी के इन्कलाब से भागा था जो कभी।
ले कर के जिन्स पेण्ट वो खद्दर पे चढ गया ।

हिम्मत को हाथ की भी जरूरत नहीं पङी।
ठाकुर बगैर हाथ के गब्बर पे चढ गया ।

राजीव कुमार

दस्त दरिया फूल सबनम और सहरा हो गया।


दस्त दरिया फूल सबनम और सहरा हो गया।
आसमां में मैं ख्यालों का परिंदा हो गया।

लोग दौलत को जहां में क्या खुदा कहने लगे।
सबकी आंखों में खुदा का अक्स पैसा हो गया ।

देखने निकला मै जब इन्सानियत की शक्ल को।
मेरे भीतर का भी इक इंसान रुस्वा हो गया।

क्या गजब लिक्खा है मजहब की किताबों में बता
या बता दे शह्र में क्युं आज दंगा हो गया ।

माल ओ जर रोटी थी या खानाबदोशी जिन्दगी।
आखरी में दरअसल सब एक किस्सा हो गया।

जब फकीरी छोङ कर ये बादशाहत थाम ली।
तब मेरा किरदार ऊचां हो के बौना हो गया।

इश्क भी दिलचस्प है हो कर कभी छुपता नहीं।
क्या पङा उल्फत में मैं दुनिया में बलवा हो गया ।

राजीव कुमार

Saturday, November 1, 2014

जिन्दगी को भला और क्या चाहिये।

गजल आप की मोहब्बतों के हवाले---

जिन्दगी को भला और क्या चाहिये।
आग पानी जमीं औ हवा चाहिये।

छूट जायेगा सब कुछ यहां एक दिन।
हमको दौलत नहीं अब दुआ चाहिये।

हस्र है एक जैसा सभी का यहां।
आखिरी में सभी को खुदा चाहिये।

जो मय्यसर नहीं हो सका है कभी।
आशिकों को वही हर दफा चाहिये।

इश्क होता नहीं है फकत हुस्न से।
थोङी शर्मो हया कुछ अदा चाहिये।

सिर्फ मेहनत से मिलती नहीं नौकरी।
इसमें किस्मत भी तो मरहबा चाहिये।

बात हक की जबां से न कहना कोई ।
हुक्मरानों को बस इक खता चाहिये।

बह रहा है लहू रोज क्यूं हर कहीं।
ये भी इंसान को सोचना चाहिये।

शायरी कुछ ख्यालों से होती नहीं।
दिल में सैलाब उठता हुआ चाहिये

मरे दुश्मन भी कहने लगे आज कल।
दिल तेरे जैसा हमको बङा चाहिये।

रंजो गम झूठ नफरत बहुत हो चुका ।
इस जहॉ को जहां दूसरा चाहिये।

राजीव कुमार

उम्र भर इश्क में सिसकियों की तरह।

गजल ख्याले यार को नज्र  ______________

उम्र भर इश्क में सिसकियों की तरह।
मैं पिघलता रहा आंशुओं की तरह।

मुस्कुराने की है ख्वाहिसें अब मेरी ।
थोङा जी लूं मैं अब दूसरों की तरह।

रात भर ढूंढता क्या रहा क्या मिला ।
बावरा दिल मेरा जुगनुओं की तरह ।

फांसलों को बङाना भी मुम्किन नहीं।
सीने में है तु ही धङकनों की तरह।

ख्वाब में भी तेरी दीद हो जाये तो।
मन मचल जाता है मनचलों की तरह।

कैसा रिस्ता हैं ये तेरा मुझसे बता।
जिन्दगी तू है क्युं दुश्मनों की तरह।

ख्वाबों के आसमां हैं ख्यालों के पर।
चल उङें दूर तक पंछियों की तरह।

जब भी करता हुं मैं खुद से बातें तेरी।
बात होती है वो शायरों की तरह।

लाख सिकवे हैं पर ये भी सच बात है।
उसकी यादें भी हैं खुश्बूओं की तरह।

आके लग जा गले रंग दे जिन्दगी।
इस चमन की हसीं तितलियों की तरह।

राजीव कुमार

तेरे सर पर कोई इल्जाम रक्खा जायेगा इक दिन।

गजल पेश ए खिदमत तवज्जो तलब ___________

तेरे सर पर कोई इल्जाम रक्खा जायेगा इक दिन।
तू इन्सां है करम तेरा भी देखा जायेगा इक दिन।

गुनाहों के सिंघासन पर हैं बैठे बादशाह जितने
उन्हें मालूम हो उनको उतारा जायेगा इक दिन

परिन्दे भी निकल आयें हैं अब ये फैसला करके ।
इन्हीं पिजङों में सैय्यादो को पकङा जायेगा इक दिन।

रहम की भीख मांगेगा समंदर चीख कर मुझसे।
मेरा गुस्सा मेरे बाहर अगर आ जायेगा इक दिन।

अभी जिन्दा हुं इस बुनियाद पर उम्मिद करता हुं।
किला फिरका परस्ती का गिराया जायेगा इक दिन/

दिया जलता हुआ कहने लगा मुझसे मेरे यारों ।
कोई माने न माने ये अंधेरा जायेगा इक दिन ।

राजीव कुमार

Monday, October 13, 2014

ये सच है उम्र भर नहीं मिलती।

गजल आप के नाम_____

ये सच है उम्र भर नहीं मिलती।
खुशी खरीदकर नहीं मिलती।

अमीरे शहर नाम का है बस।
कि रोटी पेट भर नहीं मिलती।

है डूबा नाक तक कोई लेकिन।
किसी को बूंद भर नहीं मिलती।

ये ही है मौत तेरा रुतबा भी।
किसी से पूछ कर नहीं मिलती।

ये जिद नहीं ये मेरी गैरत है।
नहीं ये दर ब दर नहीं मिलती।

हुआ है क्या तेरी मुहब्बत को।
वफा से तर ब तर नहीं मिलती।

खबर जहान की है लेकिन क्युं।
मुझे तेरी खबर नहीं मिलती।

राजीव कुमार

बस इक मैं ही नहीं तन्हा अकेले।

एक छोटी कोशिस

बस इक मैं ही नहीं तन्हा अकेले।
हर इक दुनिया से है जाता अकेले ।

बहुत कुछ जीत कर भी सोचता हुं।
मुझे खुद से भी है लङना अकेले।

मेरी ख्वाहिस हकीकत बन कभी तू।
ये जीना भी है क्या जीना अकेले।

गजल हो जायेगी मेरी मुक्मल।
कभी मिलने तो मुझसे आ अकेले ।

दिलों की दूरीयां आ कम करें हम।
कोई रिस्ता नहीं बनता अकेले।

राजीव कुमार

हर एक शै में इक कमी क्युं है।

नयी गजल अभी अभी______
हर एक शै में इक कमी क्युं है।
इसी का नाम जिन्दगी क्युं है।

जुदाई गम की खुश्क रातें है।
सुबह मगर ये शबनमी क्युं है।

मुकाबले में आज इन्सां के।
उसी की सारी बुजदिली क्युं है।

खुदा तू जानता तो होगा ही ।
जुदा मुझी से हर खुशी क्युं है।

हमारे गर्दिशों के किस्सों में।
हर इक दफा ही बेबसी क्युं है।

फसल जो अम्न की उगाते है।
उन्ही के घर में खुदखुशी क्युं है।

हमारे शहर के चिरागों से ।
खफा खफा ये रौशनी क्युं है।

सजा तो खुद ब खुद मुहब्बत है।
जमाने भर को दुश्मनी क्युं है।

यही है रंग तेरी महफिल का।
सभी में इतनी बेखुदी क्युं है।

सवाल भी तेरा ये कैसा है।
तुझी से इतनी दिल्लगी क्युं है।

मुझे पता है जानता है तू।
तेरे लिये ही आशिकी क्युं है।

राजीव कुमार

समंदर है कोई सहरा नहीं है।

गजल आप की मोहब्बतों की तालिब ___________

समंदर है कोई सहरा नहीं है।
ये मेरा दिल तेरे जैसा नहीं है।

कली तितली बहारें बाग है पर ।
मेरा मन भी कोई भौरा नहीं है।

हसीं यादें तेरी तन्हाईयों में ।
मुझे कहतीं है तू तन्हा नहीं है।

तेरी हर बेरुखी में थी मुहब्बत।
तभी मुझको कोई सिकवा नहीं है।

तुझे चाहुं मै कितना सोचता हुं।
सिवा इसके कोई चारा नहीं है।

जमाने का अगर है डर तो आजा।
खुवाबो पर कोई पहरा नहीं है।

बदलते वक्त ने बदला नहीं कुछ।
हमारे बीच क्या रिश्ता नहीं है।

है तुझसे रूह का रिस्ता तभी तो।
तुझे खोने का भी खतरा नहीं है।

यही सब कुछ तो रहता है जहन में
दिवाना दिल मगर कहता नहीं है।

राजीव कुमार

Sunday, September 14, 2014

यूं टूट कर न चाह कि दिलवर नहीं हुं मै।


यूं टूट कर न चाह कि दिलवर नहीं हुं मै।
मिट्टी हुं तेरे ख्वाब का अम्बर नहीं हुं मै।

ऐसा भी नहीं हर दफा बस टूटना ही है।
शीशा नहीं हे दिल मेरा पत्थर नहीं हुं मैं ।

नाकामीयों ने मुझको गिराया बहुत मगर।
मायूसियों के आज भी अंदर नहीं हुं मैं।

है जिनको यकीं उनके साथ साथ है खुदा
सफर ए हयात में तेरा रहबर नहीं हुं मैं।

उल्फत भी शायरी भी वफा भी मै ही करुं।
किरदार तू समझ मेरा जोकर नहीं हुं मैं ।


कब तक नचायेगी मुझे डमरू की ताल पर।
ए जिन्दगी इन्सान हुं बंदर नहीं हुं मैं।

राजीव कुमार

एक।कता


एक।कता

कुछ भरोसा हमको भी जीने की खातिर दीजिये।
ऐसे ही जीना हे तो हमको भी खंजर दीजिये।

मांग कर खाने की तो फितरत हमारी थी मगर।
मार कर खाने की खातिर एक पत्थर दीजीये

राजीव कुमार

कीजिये इनपर भरोसा सिर्फ इज्जत के सिवा।

कीजिये इनपर भरोसा सिर्फ इज्जत के सिवा।
बेटीयां कुछ और भी है घर की जीनत के सिवा।

इन अंधेरों में शहर की असलीयत मै क्या कहूँ
जालसाजी लूट धोखा सब है मेहनत के सिवा।

अच्छे दिन ले आने वाले कैसे दिन ले आये है।
कत्ल साजिश खून दंगा क्याहै दहसत के सिवा।

भूख के लगने का रिस्ता जुर्म के होने से है।
जानते है सब यहां पर इक अदालत के सिवा।

कौन मुजरिम है किसे इन्साफ मिलना चाहिये।
फैसला कोई नहीं करता है दौलत के सिवा।

हर सितम सहने का अपना ही मजा है दोस्तों।
जिन्दगी कुछ भी नहीं है अपनी हिम्मत के सिवा।

राजीव कुमार

है मुझे तेरी जरूरत तेरी हसरत के सिवा।

है मुझे तेरी जरूरत तेरी हसरत के सिवा।
कुछ नहीं है मेरे अन्दर तेरी चाहत के सिवा।

मैं बदल भी जाउं तो ये दिल बदलता ही नहीं।
ये बेचारा कुछ नहीं है तेरी सूरत के सिवा।

तेरी नजरो का ये उठना उठ के गिर जाना यूंही।
कुछ नहीं ये और करते है सियासत के सिवा।

ये लबों रुखसार ये तेरी अदाये क्या कहूँ।
मै करुं तो क्या करुं इनसे मोहब्बत के सिवा।

है बङी दुश्वारीयां इस इश्क के अहसास में।
हर सुखन होता है इसमें एक फुर्सत के सिवा।

अब लतीफों की जुबां में आशिकी मजनू की है
सोचता हूँ ये मुहब्बत क्या है जिल्लत के सिवा।

मौत को आना है वो आये भला मै क्यूं डरुं।
यू जूदा होंगे नहीं हम भी कयामत के सिवा।

राजीव कुमार

होश रखना है तो,


नज्म

होश रखना है तो,
ए मेरे हमनशी,
बेखुदि अपने दिल में ही रक्खा करो।
थोङा बहके रहो,
थोङा सुलझे रहो,
मयकशी अपने दिल में ही रक्खा करो।

बज्म ए उल्फत
को रौशन बनाउंगा मै।
सोचता था कि दिल को जलाउंगा मै।
फिर चिरागों ने मुझसे ,
लिपट के कहा।
आशिकी अपने दिल में ही रक्खा करो।

ये वही मोङ है,
ये वही है डगर,
इस डगर से जरा तू सम्भल के गुजर।
इक मुसाफिर को
रस्ते बताते रहे।
रहबरी अपने दिल में ही रक्खा करो।

राजीव कुमार

मुसीबत गुर्बतों की, वो काली रात बदले।

नयी गजल

मुसीबत गुर्बतों की, वो काली रात बदले।
फकत नारों की झूठी,सियासी बात बदले।

सिकायत इस व्यवस्था, से मेरी यूं नहीं है।
मै ऐसा सोचता हुं, कि ये हालात बदले ।

तरक्की चाहिये तो, तरक्की किजिये न।
गरीबी न भी बदले, तो इसकी जात बदले।

अगर ये हो सका तो, बदलना है इसे भी।
मै हिन्दू तू मुसलमां, ये ही जज्बात बदले।

मेरी जिन्दादिली ने, कहा इक दिन तङप के।
कयामत तू नहीं तो, तेरी औकात बदले।

मुझे मालूम है ये, तू सुनता है सभी की।
खुदाया और नहीं कुछ, तो ये हयात बदले।

राजीव कुमार

रोज हमें अखबार दिखाते खून सने किरदार नये।


रोज हमें अखबार दिखाते खून सने किरदार नये।
वही पुरानी तस्वीरों में दिखते अत्याचार नये।

मांग रहे हैं चाय बेचते भीख मांगते ये बच्चे।
हमें चाहिये हमें दिजीये, शिक्षा के औजार नये।

लाल बत्तियों की ललकारें लोकतंत्र की हाहाकारें।
संविधान कुछ इसी तरह से करता है चित्कार नये।

पेङो पर लटकी, कुछ मानवता की लाशे कहती है।
व्यर्थ ढूंढना है ऐसे में जीवन के आधार नये।

नहीं सुरक्षित सङक, बच्चियां कोख में सहमी सहमी हैं
आने वाली नयी त्रासदी के हैं ये आसार नये।

इस समाज को जात पात की टुटी किश्ती ढोती है।
और गरीबी को वादों के मिलते है बस यार नये।

सत्य अहिंसा के रखवालों की रखवाली ऐसी है।
सिर्फ सिंहांसन के खातिर ही जलते हैं घरबार नये।

गूंगी जनता बहरा राजा और चुनाव का बाजा है।
भ्रष्ट व्यवस्था को ऐसे ही मिलते है सरदार नये।

राजीव कुमार

इश्क बेचैन ख्यालों के सिवा कुछ भी नहीं


पूरी गजल

इश्क बेचैन ख्यालों के सिवा कुछ भी नहीं
ये खुशी उलझे सवालों के सिवा कुछ भी नहीं।

जिसको नादान मोहब्बत का सफर कहते हैं।
वो सफर पांव के छालों के सिवा कुछ भी नहीं।

मयकशी में तो पल दो पल खुशी है लेकिन।
जिस्त सूखे हुए प्यालों के सिवा कुछ भी नहीं।

जिस लिये जिस्म भी बिकता है जुर्म होता है।
वो महज चंद निवालों के सिवा कुछ भी नहीं ।

कैसे जाउं मैं बुङापे में मिलने बच्चों से।
घर में लटके हुए तालों के सिवा कुछ भी नहीं।

तुझमें गम के हैं अंधेरे तो आ रौशन मैं करूं।
मेरे दिल में तो उजालों के सिवा कुछ भी नहीं।

राजीव कुमार

कौन दुनिया में भला किसका खुदा हो जायेगा।


गजल --- 1

कौन दुनिया में भला किसका खुदा हो जायेगा।
सच कहुं तो एक दिन ये फैसला हो जायेगा।

जानिबे मंजिल अकेले भी अगर चलता रहा।
देखना तू ही किसी दिन काफिला हो जायेगा।

गम है क्या जो पुरखतर है जिन्दगी का रास्ता।
है जवां गर हौसला तो रास्ता हो जायेगा।

गर सियासत मुफलिसों की रोटीयों पर युं हुई।
जुर्म करने का यहां पर कायदा हो जायेगा ।

जिस तरह से मजहबी ये आधियां है चल रही।
दोस्तों इक दिन भयानक जलजला हो जायेगा।

राजीव कुमार

दर्द सीने का तेरा खुद ही दवा हो जायेगा।

गजल -2

दर्द सीने का तेरा खुद ही दवा हो जायेगा।
तू भी इक दिन चाहतों का देवता हो जायेगा।

यूं नकाब उल्टे किये न शहर में निकला करो।
फिर शरीफों के शहर में हादसा हों जायेगा।

बस मुहब्बत की नजर से इक नजर तो देख लो।
मेरी उल्फत का मुक्कमल फैसला हो जायेगा।

इक सदा हर रोज सोने ही नहीं देती मुझे।
दर्मयां दोनो के सुबहा फांसला हो जायेगा ।

गर ख्यालों में ख्याल ए यार युं आता रहा ।
आशिकी का भी गजल में सिलसिला हो जायेगा ।

हद से ज्यादा इश्क भी अच्छा नहीं है दोस्तों।
ये किसी की खुदखुशी का फलसफा हो जायेगा।

राजीव कुमार

मंजर-ए-आम के हल्के कलाम कहता हुं।

मंजर-ए-आम के हल्के कलाम कहता हुं।
मैं इन अश्कों को निगाहों के जाम कहता हुं।

ये महज लफ्जों में उलझे हुए अशआर नहीं।
मैं फसानों की हकीकत तमाम कहता हुं।

कुछ ख्यालों से तो जज्बात छलकते हैं मगर
कुछ ख्यालों को मैं तेरा ईनाम कहता हुं।

ये अकीदत है इबादत है या कुछ और बता
मैं हुं नादान, तू ही है ईमाम कहता हुं।

कल तलक आफताब तुझसे रश्क करता था।
आज महताब है तेरा गुलाम कहता हुं।

मुझको मजबूर न कर सच बयान करने को।
तू ही खुद सोच मै क्या क्या हराम कहता हुं।

सब सुखनवर हैं यहां मेरे मै सभी का हुं ।
महफिले शायरी तुझको सलाम कहता हुं।

राजीव कुमार

Tuesday, August 5, 2014

कोई आवाज़ दे दे कर बुलाता है बुलाने दो /


ग़ज़ल की एक कोशिस ______

कोई आवाज़ दे दे कर बुलाता है बुलाने दो /
जुदा होना ही है गर तो जुदाई हो ही जाने दो/

दिवाने दिल को समझाना दिवाने जान लेते है /
जो रोते हैं मोहब्बत में उन्हें रोने दो गाने दो/

जो करना है करेंगे हम किसी से हम नहीं डरते /
कोई जालिम जमाने को बताता है बताने दो/

कभी गर्दिश कभी गुर्बत कभी अंजाम का खतरा /
मिया तुमसे नहीं होगा हमे ही दिल लगाने दो/

नहीं पाते है मंजिल जो फकत रस्ते पे बैठे है /
हमे चलना है रस्ते पर हमे रास्ता बनाने दो/

यहाँ पर कौन है सच्चा खता हर एक करता है /
है उंगली उसके जानिब भी उसे ऊँगली उठाने दो/

बिना नाकामियों के कामयाबी का मजा क्या है /
है लज्जत गिर की उठने में हमे भी आजमाने दो /

राजीव कुमार

Friday, July 25, 2014

फकत आजाद होने की गुजारिश कर रहा हूँ।

फकत आजाद होने की गुजारिश कर रहा हूँ।
मै सय्यादों से चिङियों की सिफारिश कर रहा हूँ ।

सियासत से उगा देता हूँ बंजर खेत में फसलें ।
किसानो मै हूकूमत हूँ मै बारिस कर रहा हूँ ।

राजीव

शहर ए उल्फत के बदनाम मुहल्लों में रहा।

शहर ए उल्फत के बदनाम मुहल्लों में रहा।
सच्चा आशिक था मगर नाम निठल्लों में रहा।

हुस्न को दे के नवाजा था हमनें हुस्ने नजर।
कोई पूछे क्यु गूरूर उनका दूतल्लों में रहा ।

लोग कैसे जाने ये इश्क छुपा लेते है।
इश्क मेरा तो जमाने के हूहल्लो में रहा।

राजीव कुमार

फ़क़ीर है बड़ा वो सबका रहनुमा भी है/

फ़क़ीर है बड़ा वो सबका रहनुमा भी है/
ख़ुदा कभी नहीं कहता की वो ख़ुदा भी है/

उसे जो देखना चाहो तो ये जहाँ देखो ,
वही है फूल की खुसबू में वो फ़िज़ा भी है/

दिलों में पाक मोहब्बत की दास्ताँ है वो , 
वही तो इश्क़ में जिन्दा है वो वफ़ा भी है/ 

हर एक शक्स है सफर पे बेखबर लेकिन,
किसी का रास्ता किसी का हमनवां भी है

अगर हो दर्द तो रहता है वो दवा की तरह ,
हर एक साँस में चलता है वो हवा भी है

राजीव कुमार

वो दिन को रात बनाने का हुनर रखता है।

वो दिन को रात बनाने का हुनर रखता है।
खुदा ही है जो सितारों को अमर रखता है।

बिना कहे भी सदा दिल की सुन रहा है वो।
हर इक निगाह में अश्कों की खबर रखता है।

शजर पे बैठा है वो एक परिन्दे की तरह ।
वही तो जुगनु में दिये सा असर रखता है।

कुएं मे किसकी नेकीयां है ये पता है उसे।
वो इस तरह के हर कूंएं पे नजर रखता है।

कभी तो हमको मिलेगा खुदा कहीं न कहीं
यही तो सोच के बसर भी सफर रखता है।

गजल ये मेरी नहीं है उसी की है यारों।
वही तो इश्क कलमों में बहर रखता है।

राजीव कुमार

वो खयाल आंखो मे रात दिन कोई ख्वाब बन के अभी भी है।

दोस्तो ये गजल आप सभी के हवाले ----------

वो खयाल आंखो मे रात दिन कोई ख्वाब बन के अभी भी है।
वो जो आग सीने में थी कभी, वो चिराग बन के अभी भी है

जहां बारिसों का न नाम था जहां रेत उङती थी हर जगह॥
उसी दिल में जब से रहे हो तुम, वो गुलाब बन के अभी भी है

कहां दर्द कितना मिला मुझे कहां कुछ भी मुझको मिला नहीं।
ये हसीन किस्सा है प्यार का जो हिसाब बन के अभी भी है ॥

कभी दिल्लगी के लिहाज से कोई वक्त मुझको भी दिजिये।
मेरी महफिलें में गजल नहीं वो शराब बन के अभी भी है॥

मेरा हाल ए दिल मेरी हर ग़ज़ल मेरी जिन्दगी के हसीन पल॥
मैं नया लिखुं भी तो क्या लिखुं वो किताब बन के अभी भी है।

राजीव कुमार

Tuesday, July 1, 2014

बहुत से शायरों को सबसे पहले आजमाया था ।



बहुत से शायरों को सबसे पहले आजमाया था ।
गजल की इस हसीं बस्ती को तब हमने बसाया था ॥

शरीफों को या चोरों को तवज्जो सब को दी हमने।
किसी ने दिल दुखाया था किसी ने दिल चुराया था॥

गजल की सल्तनत पर कुछ हूकुमत का थे दम भरते॥
उन्हे मतले का मतलब भी हमी ने ही बताया था॥

हां ये भी सच है कि कुछ तो खता हमसे हुई होगी ।
मगर यारों खताओं ने ही तो हमको सिखाया था ।

गजल कहना हमेशा ही रहा है खेल लफ्जों का ।
किसी ने गुनगुनाया था किसी ने बस सुनाया थया

राजीव कुमार

आन रखना है तो सम्मान को जिन्दा रक्खो।


आन रखना है तो सम्मान को जिन्दा रक्खो।
कुछ भी रक्खो मगर ईमान को जिन्दा रक्खो।

ये तो कुदरत है कि हर जगह शिकारी है मगर ।
अपने अन्दर जरा इन्सान को जिन्दा रक्खो॥

मेरे सीने पे है बेखौफ इमारत का वजन॥
मै हूं मिट्टी मेरे अहसान को जिन्दा रक्खो ।

मेरे बच्चों मै बुङापे में कहां जाउगा।
मेरे घर में मेरी पहचान को जिन्दा रक्खों॥

मै मोहब्बत का दिया हूं मुझे जलना है मगर।
ऐ रकीबो तुम भी तूफान को जिन्दा रक्खो ॥

सरहदों पर है सियासत की गोलियां का कहर ।।
ए हुकुमत तुम भी इस शान को जिन्दा रक्खो॥

शायरी इश्क की जिस्मो की गुलामी न करे॥
कोई गालिब के भी दीवान को जिन्दा रक्खो॥

राजीव कुमार

Friday, June 20, 2014

हम भी गुंगे और वो बहरे रहेंगे॥

हम भी गुंगे और वो बहरे रहेंगे॥
इस व्यवस्था में सभी ऐसे रहेंगे॥

पेङ से लटकी हुई लाशों का क्या।
लोग कुछ रोते है तो रोते रहेंगे॥

कौन किसको रोकता है जुर्म से
कत्ल भी होते थे वो होते रहेगे॥

मजहबो का सच यही है आज तक।
जो धमाके हो चुके होते रहेंगे॥

हम बगावत न करें तो क्या करें।
क्या युं ही हम भी यहां सोते रहेंगे।

राजीव

Saturday, June 7, 2014

ये नज्म पुरानी है फिर भी हर बार सुनाना पड़ता है

ये नज्म पुरानी है फिर भी हर बार सुनाना पड़ता है
ये इश्क़ आग का दरिया है और डूब के जाना पड़ता है

इस दौरे नौ की बुनियादों के हर जर्रे पर लिखा है
सच्चा है कोई आशिक़ तो उसी को जान से जाना पड़ता है

लैला की पाक मोहब्बत का किस्सा न कहो सब जानते हैं
औरत को ही हर बार रफीकों मान गंवाना पड़ता है

ये जुर्म हो न हो गहरा है इस लिए हर जगह पहरा है
अपने ही शहर में अपनों से खुद को ही बचाना पड़ता ह

Rajeev kumar
दौर ए नौ, --- नया जमाना
रफीको--- दोस्तो

हमें है खबर कि बीमार हो, दवा दिल की तुम भी लिया करो॥

आज की गजल उन्हे समर्पित जो दिल के करीब है। -———--------------------—--------------------
हमें है खबर कि बीमार हो, दवा दिल की तुम भी लिया करो॥ ये गजल नही है सूरुर है,इसे चुपके चुपके पिया करो। कभी जिन्दगी भी आजाब है ,कभी खुशनुमा सा ये साज है। कोई ख्वाब बन के मेरे सनम ,मेरे साथ तुम भी जिया करो ॥ ये हालात अपने नहीं तो क्या, ना खुदा से कोई गिला करो। वो रहीम है वो करीम है ,उसे सजदा तुम भी किया करो॥ वो खयाल जिन्दा है आज तक कि यहां नहीं तो वहां सही। वो हयात हो या हो जलजला मेरा साथ तुम भी दिया करो॥ मेरी राहतें मेरी चाहतें मेरी सांस सांस का सिलसिला ॥ मेरी आशिकी का हो नाम तुम मेरा नाम तुम भी लिया करो। ये फिजा हवा ये घटा चमन ये बहार और ये बिजलियां। इन्हे किस तरह से लिखुंगा मैं, जरा पर्दा तुम भी किया करो ॥ राजीव कुमार

Sunday, May 11, 2014

सियासत कुछ नही रद्दो बदल का खेल है यारों।

सियासत कुछ नही रद्दो बदल का खेल है यारों।
किसी को बेल है यारों किसी को जेल है यारों ।

गुनाहों को सजाओं का भला अब खौफ कितना हो ।
कहां हो फैसला इसका अदालत फेल है यारों ।

अमीरी सो रही घर पर गरीबी रो रही दर पर।
मुक्कदर मुफलिसी का ये भयानक मेल है यारों।

यहां हर दिल मे रंजिश तो वहां हर दिल मे शाजिस है।
ये झूठी शान माचिस है अदावत तेल है यारों।

जमाने कितने बदले पर असल मसला वहीं पे है
कहां बिजली सड़क पानी कहां पर रेल है यारों

राजीव कुमार

Monday, April 28, 2014

इनके हिस्से में खुशी कितनी दर्द कितना है,

नयी गज़ल़

इनके हिस्से में खुशी कितनी दर्द कितना है,
इन किसानो से ना पुछो कि कर्ज कितना है/

वो जो सोते है रजाई में वो बता देंगे,
इन गरीबो से न पूछो कि सर्द कितना है।

हम को अब दिल की दवा दे दो हम तड़पते है,
हम बिमारों से ना पूछो कि मर्ज कितना है/

जिसको चाहें खरीद लें दुआ की दौलत से,
हम फकीरों से न पूछो कि खर्च कितना है/

राजीव कुमार

Thursday, April 24, 2014

शायरी हो तो वो हो जाये आशिक़ों वाली

दोस्तों एक नयी ग़ज़ल आप सभी के लिए ________

रंजिशें नफ़रतें तलवार खंजरों वाली
ऐसी बातों की हर ग़ज़ल हो जाहिलों वाली

शायरी हो तो वो हो जाये आशिक़ों वाली
इश्क़ की बात हो कुछ ऐसी पागलों वाली

लबों रुखसार, हुस्न उनका क्या कहें यारों
फूल को लब नज़र को लिक्खो कातिलों वाली

उनकी जुल्फों की घनी छाँव का असर देखो
ये फिज़ा आज भी लगती है बादलों वाली

जब भी यादो में उनके अश्क़ छलक जाये तो
खूश्बू मिट्टी की  महक उट्ठे बारिशों वाली

अब तो सैलाब ही सोचे कि क्या करेगा वो
ये मोहब्बत की कश्तियाँ हैं हौसलों वाली

राजीव कुमार


Monday, April 14, 2014

वक़्त तब कुछ और था ये जिंदगी कुछ और थी

वक़्त तब  कुछ और था ये जिंदगी कुछ और थी
वो तेरी पहली नज़र वो दिल्लगी कुछ और थी

आग पानी फूल तितली बिजलियाँ रंगीनियाँ
चाँद सूरज सब वही थे रौशनी कुछ और थी

इस शहर के मयकदों में जी रहा हूँ आज कल
पर तुम्हारे इश्क़ की वो मयकशी कुछ और थी

सच है ये भी रात दिन मिलता हूँ सबसे पर सनम
ख्वाबों में  दीदार वाली आशिक़ी कुछ और थी

अब किसी का डर नहीं दुनिया समझता हूँ मगर
"कर न दो इनकार तुम" वो बेबसी कुछ और थी

सज रहे है हर जगह अब इश्क़ भी बाजार भी
याद है मुझको तुम्हारी सादगी कुछ और थी _______राजीव कुमार 

Tuesday, April 8, 2014

उम्र का साथ भी इक पल में बिछड़ जाता है

उम्र का साथ भी इक पल में बिछड़ जाता है
रिश्ता बुनियाद से कमजोर उखड जाता है

बात तो हद से गुजरती है तब की जब वो भी
मेरी खुशियों को देख मुझपे बिगड़  जाता है

कितने पैबन्द लगे हैं वफ़ा के कपड़ों में
बस नुमाइश ही करें तो भी उधड़ जाता है

जिंदगी रोज ही लड़ती है जिन्दा रहने को
हर बुरे दौर का किस्सा भी पिछड़ जाता है

शक़ के फितरत की बीमारी की अब दवा ले लो
खांसते खांसते सीना ये जकड जाता है

आज ही कर लो अभी कर लो इस मोहोब्बत को
मौत के बाद तो ये जिश्म अकड़ जाता है

उनका पत्थर है दिल तो ये भी हकीकत है की
कुंवे की रस्सी से पत्थर भी रगड़ जाता है

यूँ ही बदनाम सियासत को न करो कोई  
मुल्क बनता है सियासत से बिगड़ जाता है

राजीव कुमार 

Thursday, March 27, 2014

तुझे क्या कहूं तू है मरहबा. तेरा हुस्न जैसे है मयकदा

दोस्तों मेरी नयी ग़ज़ल बशीर बद्र शाहब से प्रेरित___ पहली कोशिश _________

तुझे क्या कहूं तू है मरहबा. तेरा हुस्न जैसे है मयकदा
मेरी मयकशी का सुरूर है, तेरी हर नजर तेरी हर अदा

तेरे इख़्तियार में है फिजा, तू खिज़ां का जिश्म सवार दे
मुझे रूह से तू नवाज दे, मुझे जिंदगी से न कर जुदा

कभी रोशनी कभी बज्म में, तू जहाँ जहाँ मैं वहाँ वहाँ
तेरी खुश्बुओं के शहर में ही, फिरुँ बेखबर रहूँ गुमशुदा

तेरी चाहतों से चमन बने , जहाँ इश्क़ खिलता गुलाब हो,
मेरी हसरतों की ग़ज़ल बने , या बने तेरा कही बुतकदा

कोई रात हिज्र की न कटे, न मोहोब्बतों की शमा बुझे
मेरी आशिक़ी को कुबूल कर, तू मुआफ कर मेरी हर खता

_________ राजीव कुमार

कभी बारिश कभी बिजली कभी बादल समझते हैं

कभी बारिश कभी बिजली कभी बादल समझते हैं
हम उनकी आहटों को आज भी पायल समझते है

वो झुकती हर नज़र थी तीर अब तलवार हैं यादें
हमे अब लोग भी हारा हुआ घायल समझते है

लकीरें उसके चेहरे की अभी खामोश हैं शायद
छलकते अश्क़ न बोले मगर काज़ल समझते है

यक़ीनन दिल के दरवाजे को वो भी खोल ही देगा
के आशिक़ कब ज़माने को कोई हायल समझते है

मुझे रुशवाईयों से अब जरा भी डर नहीं लगता
मेरे मेहबूब ही मुझको कोई पागल समझते है

हायल - बाधक

राजीव कुमार

क्युं तू अन्जाम की परवाह किया करता है.

दोस्तों पेश है गीत_________

क्युं तू अन्जाम की परवाह किया करता है.
इश्क मरता नहीं इन्सांन मरा करता है।

ये हकीकत है कि ये दौर गुजर जायेंगे
हम भी तारीख के पन्नों से उतर जायेंगे
कोई जब इश्क की नजरों से कहीं देखेगा
उसकी यादों के झरोंखों मे नजर आयेगे।

बेसबब दिल भी तेरा युँ ही डरा करता है
इश्क मरता नहीं इन्सांन मरा करता है।

क्युं तू अन्जाम की परवाह किया करता है.
इश्क मरता नहीं इन्सांन मरा करता है।

राजीव कुमार

दिल में उनको रखा ये खता क्या हुई,

दिल में उनको रखा ये खता क्या हुई,
इक दिया इन निगाहों में जलने लगा/
उनकी उल्फत में हम क्या कहें क्या हुआ,
इश्क़ भी मोम जैसे पिघलने लगा/

बारिशें सहमी सहमी बरसती रहीं,
बिजलियाँ अपने धुन पर गरजती रहीं/
ये फिज़ा ये हवा सब खफा हो गये.
इस चमन का बदन भी  बदलने लगा/

रौशनी अब अंधेरों को मिलती नहीं,
आशिक़ों का है क्या कुछ नहीं कुछ नहीं/
जिश्म अपना नहीं रूह अपनी नहीं,
ख्वाहिशों का भी दम यूँ निकलने लगा/

ये जमाना पुराना फ़साना रहा,
फिर भी ये दिल दीवाना दीवाना रहा /
मंजिलें  रूठती मुस्कुराती रहीं,
उनके जानिब मगर दिल भी चलने लगा/

इम्तहां इश्क़ की और कितनी सहें
कुछ बताओ कहाँ और किससे कहें
ख्वाब भी रात को अब सताने लगे
जां तड़पने लगी जी मचलने लगा/

राजीव कुमार 

Wednesday, March 5, 2014

इन्क़लाब क्या है_____

इन्क़लाब क्या है_____

नसों में गर्म खून हर जवान, इन्क़लाब है
जो खीच ले जमीं पे असमान, इन्क़लाब है

दमन के ठोकरों से उठ के आधियाँ जो बन गयी
वो दर्द और सितम की दास्तान इन्कलाब है

जमीन बंजारों की है तो हौसले का हल चला
उगा दे इक नयी फसल किसान इन्क़लाब है

ये आग जुल्म की है तो हमे जला न पायेगी,
के जिश्म पे पड़े हर इक निशान इन्क़लाब है

महल तेरे ही हाथ से खड़े हुए है भूल मत
तू याद रख तेरा भी ये मकान इन्कलाब है

खामोश हैं जो लब तो तू तूफान सामने समझ
हक़ों की चाह में तो ये जबान इन्कलाब है

राजीव कुमार 

Sunday, March 2, 2014

मोहब्बत के मुक़दमे में खरा मुझको उतरना है

दोस्तों पेश है ताज़ा तरीन ग़ज़ल _________

मोहब्बत के मुक़दमे में खरा मुझको उतरना है 
मुअक्किल है मेरा ये दिल सवालों से उबरना है 

वफ़ा का जुर्म है अपना जमानत हो न पायेगी 
अदालत है ज़माने की गवाहों को मुकरना है 

दलीलें बे बे अशर होंगे कई इलज़ाम हैं मुझ पर 
सिकायत है जिन्हे मुझसे उन्हें इंसाफ करना है 

सजा देना तो दे देना मगर मुझको बता देना
मेरी यादों के किस्सों को कहाँ पर जा के मरना है

मेरे मुंसफ दो मोहलत फिर सम्भालूँ मैं मेरे दिल को
बहुत से हादसों को फिर मेरे दिल से गुजरना है

कचहरी कायदे कानून मुझसे सब खफा हैं क्यूँ
मोहब्बत के परिंदों के परों को फिर कतरना है

राजीव कुमार

बुरा है तो भला क्या है, खलिश है तो खला क्या है

बुरा है तो भला क्या है, खलिश है तो खला क्या है
सवालों से हुआ क्या है, सवालों में भला क्या है 

मुकद्दर अपने घर पे है, मुसीबत हर डगर पे है, 
जो होना है हुआ ही है, दुवाओं से टला क्या है/

जमाना जिद पे है कायम, नफासत हो गयी गायब, 
ये ही दौर ए तरक्की है, हवाओं में घुला क्या है/

भयानक है बड़ा मंजर, हर इक हाथों में है खंजर,
ये ख्वाहिश है की साजिश है,दिलों में ये पला क्या है/

शिकन माथे की गहरी है, मादर-ए-हिन्द कहती है,
गुलामी फिर से आनी है, गुलामों से गिला क्या है /

ये हुस्न ओ इश्क़ के जलवे, जहाँ जैसे हैं रहने दो,
यहाँ मेहनत से शोहरत है, अदाओं से मिला क्या है/

राजीव कुमार

*मादर-ए-हिन्द ---भारत माता
*दौर ए तरक्की--- आधुनिक युग

Friday, February 14, 2014

गम के कोहरे को तुझे चीर के आना होगा

ग़म के कोहरे को तुझे चीर के आना होगा 
याद रखना तेरा दुश्मन भी जमाना होगा

सारे अपने तुझे रोकेगें रकीबों की तरह  
तुझको ये रश्म भी सिद्दत से निभाना होगा/

लब ए खामोश पे सैलाब ए मोहब्बत रख कर, 
हाल ए दिल अपनी निगाहो से बताना होगा 

जिश्म की कैद में आ जाये अगर रूह ए वफ़ा 
अपने हाथों से तुझे खुद को मिटाना होगा 

मुफ्त मिल जाती है शोहरत ये मुकद्दर है मगर 
इश्क़ करना है तो आ करके दिखाना होगा _______

राजीव कुमार 

Sunday, February 9, 2014

न तुझे मिला, न मुझे मिला/

रहा गर्दिशों, में ये काफिला,
न रुका कभी, भी ये सिलसिला
मेरे दिल बता, है सुकूं कहाँ,
न तुझे मिला, न मुझे मिला/

ये तेरा मिज़ाज़, था इश्क़ का
तेरी दिललगी, थी नहीं कोई
तेरा हुस्नो इश्क़, का फैसला
तुझे क्या मिला, मुझे क्या मिला

जरा देख तो कि, हुआ है क्या
जरा सोच तुझमे, बचा है क्या
जो बसा था तुझमे, वो खो गया
न तुझे मिला, न मुझे मिला

मुझे उनसे, कोई गिला नहीं
वो चले गए, तो यही सही,
तेरी आशिक़ी, मेरा हौसला
न तुझे मिला, न मुझे मिला

_______राजीव कुमार

Wednesday, February 5, 2014

हमको सब लोग समझदार नज़र आते है

हमको जो लोग समझदार नज़र आते है
उन्हें हम ही बड़े लाचार नज़र आते हैं

इश्क़ जब से किया है जाने क्या हुआ तब से
हम ज़माने को गुनहगार नज़र आते हैं

उनकी यादों की शायरी को जब से थामा है
अब तो घर बार भी बेकार नज़र आते हैं

जब से आंखों में उन्हें कैद करके रक्खा है
तब से कैदी भी हवलदार नज़र आते हैं

जितने इल्जमे वफा हैं वो मेरे सर रखिये।
अजी हम ही तो खतावार नज़र आते हैं ।

जब से कीमत दिलों की लग गयी बाज़ारों में
जो थे अपने वो  खरीदार नज़र आते हैं

जिनको हमदर्द रहबरी ही लूट लेती है
उनको रहजन भी मददगार नज़र आते हैं

बेखुदी  कहो लो या,कहो, मेरा दीवानापन
बंद आँखों से भी सरकार नज़र आते हैं

राजीव कुमार 

Thursday, January 23, 2014

इश्क़ वाले, मेरे किस्सों, की दुहाई देंगे/

तेरी यादें, मैं हूँ जिन्दा, की गवाही देंगे,
इश्क़ वाले, मेरे किस्सों, की दुहाई देंगे/

न जगा,कैद है चेहरा,तेरा मेरी आँखों में,
ये उजाले ,मुझे तुझसे, ही रिहाई देंगे /

अश्क सीन में, दबा लूँ, फिर भी डर लगता है
दूर से, जख्म ए जिगर, मेरे दिखाई देंगे/

तुमसे हारा हूँ, तो हारा हूँ, चलो अच्छा है,
अब तो दुश्मन भी मेरे मुझको बधाई देंगे

जाम तो, नाम से बदनाम है, जमाने में,
इस लिये,जश्न-ए-तबाही में, मिठाई देंगे/

आग से आग, बुझाते है, हुनर उनका है,
हम भी अब, आंख के शोलों को, हवा ही देंगे/

मौत आती है तो आ जाये कौन डरता है,
इश्क करते थे, करेंगे, न सफ़ाई देंगे/

बेवफ़ा हो हसीन हो खुदा नहीं हो तुम,
मेरे हिस्से की सजा मुझको ,खुदा ही देंगे

यार मेरे जिन्हे कम्बख्त कहा करता था,
वो ही जख्मो को मेरे फिर से दवाई देंगे/_

काश के आस का अहसास अभी जिन्दा है,
मेरे अपने मुझे देंगे तो दुआ ही देंगे/

शेर ग़ज़लों की भी लफ़्ज़ों से मेरे अन-बन है,
इश्क़ से होंगे शुरू फिर भी जुदाई देंगे/

राजीव कुमार 

Thursday, January 16, 2014

15 जनवरी को मेरे जन्मदिवस पर मेरे बहुत सारे मित्रों ने मुझे बधाई सन्देश दिए और सुभकामनाये भी दी. उन सभी मित्रों को दिल की गहराइयों से मेरा धन्यवाद और आभार स्वरुप भेंट है ये ग़ज़ल


15 जनवरी को मेरे जन्मदिवस पर मेरे बहुत सारे मित्रों  ने मुझे बधाई सन्देश दिए और सुभकामनाये भी दी. उन सभी मित्रों को दिल की गहराइयों से मेरा धन्यवाद और आभार स्वरुप भेंट है ये ग़ज़ल

सराफत छोड़ देता तो इलेक्शन लड़ गया होता
सियासत पर नहीं लिखता अगर मैं डर गया होता

कमाई से भी ज्यादा खर्च है ईमान रखने में,
समझ जाता तो अब तक दौलतों से तर गया होता/

वफ़ा ज्यादा जरुरी है किसी के इश्क़ से पहले,
अगर पहले पता होता मोहब्बत कर गया होता/

अभी भी दूर रहता हूँ हसीनो की अदाओं से
मैं जो भी हूँ,नहीं होता जो इनके दर गया होता/

ख़ुदा मिलता नहीं है ईंट पत्थर के मकानो में,
अगर मिलता तो मैँ हर एक पत्थर पर गया होता/

दुवाओं ने सम्भाला है मुझे जिन्दा भी रक्खा है,
न  होते जो तुम मेरे यारों तो कब का मर गया होता/

राजीव कुमार

Saturday, January 11, 2014

हमे हुकूक चाहिए,

जो है हमारा लेंगे हम,
दमन नहीं सहेंगे हम 
मुकद्दरोँ से रहमतों को,अब नहीं है मांगना,
असल हुकूक क्या है अब,वही है हमको जानना/
हमे हुकूक चाहिए,
हमे हुकूक चाहिए

वो कौन हैं जो नफरतों के बीज हम में बो गए,
हुकूमतों में बैठ कर तिज़ारतों में खो गए,  
उन्ही की बेरुखी से हम हैं भूख के चपेट में,
भरोसे के निवाले ही हैं अब हमारे पेट में /
सवाल अब करेंगे हम,
जियेंगे या मरेंगे हम,
बिना जवाब के तो अब नहीं है हमको मानना ,
असल हुकूक क्या है, अब वही है हमको जानना/
हमे हुकूक चाहिए,
हुकूक चाहिए हमे /

वतन के इज्ज़तों पे है नजर गड़ाए भेड़िया,
इन्ही के राज में पड़ी हैं बेटियों को बेड़ियां/
ये तन पे आज नारियों के चोट के निशान क्यों,
बदन बदन हुए हैं बस हवस के ही गुलाम क्यूँ ,
तू बेवा है बहु भी है ,
लड़ाई है लहू भी है/
हर एक जुल्म का है, अब हमे हिसाब मांगना /
असल हुकूक क्या है, बस वही है हमको जानना/ 
हमे हुकूक चाहिए,
हुकूक चाहिए हमे /

रहम की आस में रहा तो,घर तेरा जलेगा अब,
सिसकता ही रहेगा तो, तू ही यहाँ मरेगा अब,
खुशी नहीं मिलेगी मांग कर जहां में जान ले,
कोई न कुछ कहेगा न सुनेगा अब ये मान ले,
तू अपने डर को मार दे,
खुदी को खुद उबार दे
किसी के खौफ को भी अब हमे नहीं है मानना,
असल हुकूक क्या है, अब वही है हमको जानना/
हमे हुकूक चाहिए,
हुकूक चाहिए हमे /

मुकाम अपने नाम पर नहीं हुआ तो क्या हुआ,
किसी की रहबरी से आज तक भला कहाँ हुआ/
फसल भी अम्न की कही अभी तलक उगी नहीं,
बिना लड़े किसी को जिंदगी कभी मिली नहीं/
उठेंगे न झुकेंगे हम,
कि अब नहीं रुकेंगे हम ,
सीतम के सरहदों के हद, को भी है हमको नापना.
असल हुकूक क्या है, अब वही है हमको जानना/
हमे हुकूक चाहिए,
हुकूक चाहिए हमे /

नजर उठा के देख ले समय को और हालत को,
निहत्थों की कभी नहीं सुनी गयी है बात को/
कटार अपने म्यान से,तू क्यूँ नहीं है खींचता , 
बिना लहू बहे कोई नहीं है जंग जीतता 
न और इंतज़ार कर
की उठ के तू प्रहार कर,
तू कर ऐलान-ए-जंग, मिल के हम करेंगे सामना/
असल हुकूक क्या है, अब वही है हमको जानना/
हमे हुकूक चाहिए,
हुकूक चाहिए हमे /

जो है हमारा लेंगे हम,
दमन नहीं सहेंगे हम 
मुकद्दरोँ से रहमतों को,अब नहीं है मांगना,
असल हुकूक क्या है अब,वही है हमको जानना/
हमे हुकूक चाहिए,
हमे हुकूक चाहिए

राजीव कुमार

Thursday, January 9, 2014

किसानो की किसानी क्या है ये कर्ज़ा बताता है,


किसानो की किसानी क्या है ये कर्ज़ा बताता है,
बीमारी थी भयानक आज कल ख़र्चा बताता है/

दवा दारु के बाज़ारों का मौसम भी गुलाबी है,
हकीमो के यहाँ बीमार का पर्चा बताता है

जमाना किस तरह बनता है दुश्मन इश्क़ का अक्सर,
गरम अफवाह से बाज़ार का चर्चा बताता है/

हर एक ओहदे की अपनी हैसियत होती है दफ्तर में,
असल कीमत मगर ईमान का दर्ज़ा बताता है/

राजीव कुमार

Saturday, January 4, 2014

मुहब्बत ख़ुद नहीं मरती तिज़ारत मार जाती है। तुम्हारे शह्र में हमको शराफत मार जाती है ।

ग़ज़ल

मुहब्बत ख़ुद नहीं मरती तिज़ारत मार जाती है।
तुम्हारे  शह्र में हमको  शराफत मार जाती है ।

मसाइल में घिरी रहती है सबकी ज़िंदगी लेकिन ।
हुनर, औकात से ज्यादा की चाहत मार जाती है।

गले मिलते हैं होली पर ज़हन में ईद को रख कर।
ये रिश्ते यूँ नहीं मरते सियासत मार जाती है।

किसी भी मुल्क़ की ताकत वहाँ तालीम है यारों।
हो गर बुनियाद कच्ची तो ईमारत मार जाती है ।

हम अपने दुश्मनों के हाथ से मरते नहीं लेकिन ।
हमे फिरका परस्ती की विरासत मार जाती है।

राजीव कुमार

Wednesday, January 1, 2014

मैं अच्छा हूँ अच्छाई हूँ, बुरा हूँ मैं बुराई हूँ

मैं अच्छा हूँ अच्छाई हूँ
बुरा हूँ मैं बुराई हूँ
मैं सच के साथ झूठा हूँ
मैं सच्चा हूँ सच्चाई हूँ,

मेरा ईमान कच्चा  है,
हर इक इंसान बच्चा है/
मेरा  मजहब नहीं कोई ,
मैं हिन्दू  हूँ  ईसाई हूँ /

दवा हूँ सब मरीजों का,
मैं दारु हूँ रहीसों  का/
किसी का जिस्म भी हूँ मैं,
मैं दिल भी हूँ दुहाई हूँ/

कही गुमनाम भी हूँ मैं ,
कहीं बदनाम भी हूँ मैं /
नहीं सैतान है मुझसा,
मैं कातिल हूँ कसाई हूँ/

सभी का इश्क़ भी हूँ मैं
वफ़ा मुझसे ही है सबको/
मगर अंजाम मेरा है ,
मोहब्बत हूँ जुदाई हूँ

सलाखो में पड़ा हूँ मैं,
निगाहों में गड़ा हूँ मैं /
नहीं मालूम है उनको
मैं कैदी हूँ रिहाई हूँ

मैं पैसा हूँ मैं दौलत हूँ,
मैं चाहत मैं ही सोहरत हूँ
ज़माने का हक़ीक़त हूँ
खुसामद हूँ अकीकत हूँ

© राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...