आन रखना है तो सम्मान को जिन्दा रक्खो।
कुछ भी रक्खो मगर ईमान को जिन्दा रक्खो।
ये तो कुदरत है कि हर जगह शिकारी है मगर ।
अपने अन्दर जरा इन्सान को जिन्दा रक्खो॥
मेरे सीने पे है बेखौफ इमारत का वजन॥
मै हूं मिट्टी मेरे अहसान को जिन्दा रक्खो ।
मेरे बच्चों मै बुङापे में कहां जाउगा।
मेरे घर में मेरी पहचान को जिन्दा रक्खों॥
मै मोहब्बत का दिया हूं मुझे जलना है मगर।
ऐ रकीबो तुम भी तूफान को जिन्दा रक्खो ॥
सरहदों पर है सियासत की गोलियां का कहर ।।
ए हुकुमत तुम भी इस शान को जिन्दा रक्खो॥
शायरी इश्क की जिस्मो की गुलामी न करे॥
कोई गालिब के भी दीवान को जिन्दा रक्खो॥
राजीव कुमार
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