Monday, December 1, 2014

मेरा वजूद भी अब तक मिटा नहीं पाया ।

नयी गजल पेश ए खिदमत

मेरा वजूद भी अब तक मिटा नहीं पाया ।
सफर हयात का मुझको थका नहीं पाया ।

गुलों से खुश्बू ए गुलसन उङा नहीं पाया ।
वो भौरा रंगत ए गुल भी चुरा नहीं पाया।

हजार जख्म थे सीने पे इस लिये शायद।
नजर रकीब भी मुझसे मिला नहीं पाया।

मेरा मिजाज भी कुछ उस दरख्त जैसा है।
कोई तूफान भी जिसको गिरा नहीं पाया ।

बहुत से रहनुमा आये हमारी बस्ती में।
कोई भी झुग्गीयां लेकिन हटा नहीं पाया।

न जाने कैसे वो अच्छे दिनों को लायेगा।
जो अम्नो चैन अभी तक तो ला नहीं पाया।

वो जिसके नाम के पत्थर भी तैर जाते थे।
वही तो नाव भी अपनी बचा नहीं पाया।

तङपते भूख से बच्चो को आज तक शायर।
कलाम अपने सुना कर हसा नहीं पाया।

हर एक हाल मे जिन्दा वफा रही मेरी ।
तिरंगा मेरा वो दुश्मन झुका नहीं पाया ।

राजीव कुमार

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