Monday, April 14, 2014

वक़्त तब कुछ और था ये जिंदगी कुछ और थी

वक़्त तब  कुछ और था ये जिंदगी कुछ और थी
वो तेरी पहली नज़र वो दिल्लगी कुछ और थी

आग पानी फूल तितली बिजलियाँ रंगीनियाँ
चाँद सूरज सब वही थे रौशनी कुछ और थी

इस शहर के मयकदों में जी रहा हूँ आज कल
पर तुम्हारे इश्क़ की वो मयकशी कुछ और थी

सच है ये भी रात दिन मिलता हूँ सबसे पर सनम
ख्वाबों में  दीदार वाली आशिक़ी कुछ और थी

अब किसी का डर नहीं दुनिया समझता हूँ मगर
"कर न दो इनकार तुम" वो बेबसी कुछ और थी

सज रहे है हर जगह अब इश्क़ भी बाजार भी
याद है मुझको तुम्हारी सादगी कुछ और थी _______राजीव कुमार 

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